आरटीओ दफ्तरों का असल सच

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ईमानदार अफसरों के लिए एक नोक और निकल आयी। अभी तक अड़ियल बाबू और दलालों से ही पाला था, अब आॅनलाइन षिकायतें हो गयीं अफसरों के लिए नोकदार भाला। पहले ही स्टाफ की कमी से जूझ रहे आरटीओ व एआरटीओ दफ्तरों को अब आॅनलाइन षिकायतें बन गयीं व बनेंगी मलेरिया। कभी बिजली रूलाती है तो कभी डीएल व रजिस्टेªषन सहित तमाम कामों की लम्बी लम्बी लाइनें मूंह चिढ़ाती हैं। ऊपर से राजस्व वसूली के लिए षासन का सोंटा तो अफसरों को झकझोर ही देता है। हम सरकार की योजनाओं की बुराई नहीं कर रहे, अफसरों की भी हिमायत नहीं ले रहे मगर एक भी दिन काष षासन स्तर के अफसर को किसी भी एआरटीओ दफ्तर में बैठा दिया जाये तो आंधी की तरह रोज आ रही नई हवाहवाई घोशणायें बिना संसाधन और कर्मचारियों के काष उनकी भी आंखे पीतल कर देती। सूबे भर में बकाया है अरबों का राजस्व, मगर सबसे घातक है फर्जीफिकेषन का असली रजिस्ट्रेषन। उससे भी खतरनाक है लुढक लुढक कर चल रहे दफ्तरों को काष अड़ियल और पेषेवर बाबूओं से छुटकारा मिल जाता। इनका बस चले तो साइकिल का ट्रक और भैंसिया को बस बनाकर दौड़ा दें, क्योंकि ये हैं आरटीओ दफ्तर के बड़े बाबू। सभी एक जैसे भी नहीं हैं मगर ज्यादातर कोई छोटे बाबू, कोई चपरासी बाबू और कोई है कंप्यूटर मास्टर, मगर सबकी पसंद हैं जठर दलाल, कोई दबंग और कोई बंदूक वाला दलाल। पहुंच भी इतनी कि एआरटीओ तो कुछ नहीं मंडल स्तर के अधिकारियों को भी यह टोली लप्पूझन्ना समझती है, यह नहीं मानते हैं तबादला आदेष, और इन जुगाड़तंत्रियों का तबादला होता भी नहीं सालों साल, और बाहरी जिलों/राज्यों से एनओसी लेकर आने वाले पुराने वाहनों पर यह जोड़ी खूब खेल करती है। फिलहाल सैकड़ों बाइकें बन गई लग्जरी गाड़ियां और खचाड़ा जीपें हो गईं ट्रक, दौड़ रहे सड़कों पर, यूं तो सूबे में पिछले 11 साल से फाइनेंस कंपनियों ने अरबों का चूना बीमा कंपनियों को लगाया है, बैंको ने अंधे होकर बांटा फाइनेंस और थोप दिया बीमा कंपनियों के कर्मचारियों व अफसरों से मिलकर युनाईटेड, नेषनल, ओरियंटल सहित दर्जनों बीमा कंपनियों पर। खैर चोरी की गाड़ियां पर सही नंबर दर्ज करने में परिवहन विभाग उत्तर प्रदेष, देष के कई राज्यों में सबसे अव्वल रहा जिनमें बरेली, हरदोई, फरूखाबाद, उन्नाव, लखीमपुर, षाहजहांपुर, मैनपुरी, बाराबंकी, चित्रकूट, महोबा, सिद्धार्थनगर, पीलीभीत, बहराइच, जौनपुर व बलरामपुर में तो हदें ही पार हो गईं। हालांकि मथुरा, और इटावा भी पीछे नहीं रहे मगर अफसोस यह कि दसों साल से होता आ रहा यह गोरखधंधा 100 फीसदी में 30 फीसदी तक अभी भी रफ्तार पर ही है। पढ़कर तो कहानी लगेगी मगर देष की अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, तष्करी और बड़ी से बड़ी वारदातों में इन फर्जी गाड़ियों की भूमिका महत्वपूर्ण रही और अभी भी साबित हो रही है, यही वजह है कि सड़क छाप और षातिर लोगों की वाहन फाइनेंस कराने में बयार सी आई हुई है। क्योंकि इन्हें दसों लाख के फाइनेंस पर लाख पचार हजार देकर ही छुटकारा मिल जाता है। गाड़ी फाइनेंस होते ही खेल ही बदल जाता है, और दलाल व आरटीओ दफ्तर कर्मचारी मिलकर संबंधित जिले से, दूसरे जिले से या दूसरे राज्यों से वह रजिस्ट्रेषन नंबर तलाष कर नई फाइनेंस की हुई गाड़ी पर लगा देते हैं और उस पर इंजन व चेचिस नंबर भी आधुनिक तरीके से लिखकर बदल देते हैं, अब नई फाइनेंस की हुई गाड़ी पर नंबर दूसरा हो गया, ऐसे में बैंक कर्मी जान बूझकर भी कानूनन कुछ नहीं कर सकते क्योंकि जिस नंबर की गाड़ी को बैंक ने फाइनेंस किया है, वह नंबर की गाड़ी का तो नाम निषान नहीं रह गया, अब आप समझ लीजिये कि इस खेल में बैंक कर्मी भी घुटने टेक और बेबस। वहीं दलाल और पेषेवर वाहन स्वामी मालामाल। हालांकि एक एक पेषेवर के पास एक भी गाड़ी नहीं मगर दस दस गाड़ियों के रजिस्ट्रेषन कब्जे में जिससे इन्हें फाइनेंस लेने में आसानी होती है। ऐसे में बैंक को नहीं पता कि फर्जीवाड़े के ढेर के नीचे बड़ा राज छुपा होता है, और कंप्यूटरी कृत जमाने में भी यह खेल आसानी से होता है। मगर कैसे रूकेगा यह गोरखधंधा? किस तरह देष व देष वासियों की सुरक्षा व अर्थव्यवस्था से हो रहे खिलवाड़ को बंद किया जा सकता है, फिलहाल समस्या टीम के इस खुलासे से परिवहन विभाग के तमाम ईमानदार आला अफसर बेहद खुष भी हैं और बेहद दुखी भी। बहरहाल हर तबाह हुई दो पहिया, चार पहिया और इससे बड़ी गाड़ी का लेखा जोखा आरटीओ दफ्तरों में सख्त न किया गया और एनओसी की सही बैरीफिकेषन दूसरे जिले व राज्य से नहीं आ जाती, तब तक असल रजिस्ट्रेषन न रोका गया तो यह खेल देष व देषवासियों के लिए अर्थव्यवस्था, सुरक्षा सब पर खतरा बनकर हावी रहेगा। मगर हैरानी यह कि इस खुलासे पर ज्यादातर जिला व मण्डल स्तर के अफसर सहयोग न करके सिर्फ गोरखधंधे पर पर्दा डालने की कोषिष करते हैं, कई बार तो खाकी को भी सामने करके युद्ध स्थिति खड़ी करने की नौबत ला देते हैं, और इससे भी बदतर हाल कमिष्नरी और षासन स्तर के अफसरों का है। ऐसे में खुलासा करने वाले ही या तो थक जायें या की जाये सबूतन अदालती लड़ाई जो मीडिया कर्मियों के लिए खासी जोखिम से कम नहीं है। मगर यह सच है कि 21 जिलों में आज भी गोरखधंधे पर जवाब नहीं है, समस्या टीम ने 3 साल पहले इन जिलों से आर0टी0आई0 के माध्यम से उन 4 साल पुराने वाहनों की सूची नये व पुराने वाहन स्वामियों के नाम व पता सहित मांगी थी जिनका रजिस्ट्रेषन दूसरे जिलों व राज्यों से आई एनओसी के माध्यम से हुआ है। यह जानकारी किसी भी जिले के पास नहीं मिली, जिसमें बरेली आरटीओ का जवाब तो बहुत ही अजब गजब था कि हमें जनता ने मना कर दिया है। अब आप समझिये कि आरटीआई लगते ही महज सात दिन में यह जवाब आ गया तो आप समझ लीजिये कि मण्डल को छोड़कर देष के कोने कोने से आयीं तमाम गाड़ियों के स्वामियों से महज सात दिन के अंदर अंदर यह आपत्ति किस तरह मिल गयी काष आरटीओ साहब को यह अंदाजा हो जाता। फिलहाल लालू के चारा घोटाले में उन्नाव, हरदोई में कम मगर बरेली मण्डल से ज्यादा दर्ज हुयी गाड़ियां सीबीआई को हाथ लगी थीं। हालांकि यही हाल सूबे के अन्य 21 जिलों का है मगर समस्या टीम के कैमरे में भी जो 66 से ज्यादा तबाह व खत्म हुयी गाड़ियों के साथ साथ बाईकों से बनायी गईं लग्जरी गाड़ियां व ट्रक सबूतन कैद हैं जिन्हें दूसरे जिलों व राज्यों से एनओसी की ओट में असली किया गया हैे और जिन पर कोई पुख्ता सबूत भी नहीं हैं कि ये आयी हुई एनओसी असली है या नकली काष इसकी बारीकी से जांच की जाये तो सूबे के हजारों वाहनों, वाहन स्वामियों, दलालों व कर्मचारियों के साथ साथ कुछ षातिर अफसरों की भी गर्दनें लटक सकती हैं।