छोटी–छोटी गोल मटोल सरसों के बड़े बड़े लहलहाते खेत बहार लाते हैं

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सर्दी का मौसम खिसकने की तैयारी में होता है तो वासंती सपने हौले से जीवन में प्रवेश कर जाते हैं। खुली आंखों से दिख रहे इन सपनों की शुरूआत होती है हरे रंग की गोद में खुशबू में लिपटे हुए सुर्ख पीले रंग के फूलों से। चाहे पतझड़ की उदासी प्रकृति को वीरान करने पर तुली हो मगर छोटी–छोटी गोल मटोल सरसों के बड़े बड़े लहलहाते खेत जीवन में बहार ला देते हैं। ऐसा लगता है जीवन की बंजर होती जा रही धरती में भी बसंत आ गया। सरसों के खेत प्रकृति के विराट आंगन में बिछे मखमली गलीचे की मानिंद लगते हैं। मन करता है इतिहास से अपने बचपन को निकाल कर प्रकृति की गोद में उन्मुक्त छोड़ दिया जाए। वैसे भी निर्मल आनंद के लिए कोई उम्र बाधा नहीं होती। प्रकृति प्रेमियों के लिए हरियाली में बिछी सरसों की पीलिमा का आकर्षण अन्य फूलों जैसा ही है। माना भी गया है कि पीला रंग जिज्ञासा, जीवंतता एवं उल्लास का संदेशवाहक है इसलिए यह विशिष्ट रंग यहां भी खूब रंग जमाता है। सरसों लहलहाती है तो किसानों को व्यवसायिक अनुभूति होती है मानो खेतों में पीला सोना उग आया हो। उनको अपने सपने पूरे होते दिखते हैं।

सरसों का महत्त्व कभी कम नहीं हुआ बल्कि समय के साथ बढ़ता ही गया। इतिहास में दर्ज है कि ईसा से 1800 वर्ष पूर्व जब आर्य इस धरती पर आए तब भी सरसों का उपयोग होता था। ईसा से अधिकतम 2300 बरस पहले सिन्धु घाटी की सभ्यता मोहनजोदड़ों व हड़प्पा में हुई खुदाई बताती है कि मांस पकाने के लिए सरसों का तेल प्रयोग होता था, सरसों के बीज मिले हैं एक जगह, छानुदाड़ों से। हमारे देश में भूरी सरसों, पीली सरसों, तोड़िया (तोरिया) व राई की मिश्रित फसल को उगाया जाता है जिसे तिलहनी फसल भी कहते हैं। इसका वास्तविक नाम ब्रेसिका है जो कुसिफेरी फैमिली की है। भारत में सरसों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, बिहार, झारखंड, असम, उड़ीसा, हिमाचल में ज्यादा होती है अन्य राज्यों में भी होती है मगर कम। पीली सरसों के दूसरे नामों में बंगा सरसों, रारा (राड़ा) सरसम शामिल हैं। खाने में सरसों के तेल के बाद नम्बर आता है सरसों के साग का। पंजाब की सरसों का साग जो अपनी पक्की सहेली मक्की की रोटी के साथ दुनिया भर में मशहूर है। मक्की का आटा पहाड़ी मीठी मक्की का और घराट में पिसा हो और रोटी चूल्हे में सिकी हो तो स्वाद कई गुणा बढ़ कर स्मरणीय हो जाता है। खाने में बाजरे की रोटी, लस्सी व सरसों के साग का संगम कई स्वादों को फीका कर देता है। साग खाने वालों को बासी साग और ज्यादा स्वादिष्ट लगता है। ग्रामीण अंचल का तो बेहद स्वीकृत व प्रसिद्ध आहार है ही सरसों का साग।
बात फिर लौट कर सरसों के खेतों पर लहलहाते पीले फूलों पर आती है। इन पीले बासंती फूलों ने कवियों, साहित्यकारों, कलाकारों को भी कम आकर्षित नहीं किया। कितनी कविताओं, लोकगीतों व कहानियों में सरसों की महक के फूल खूबसूरती से खिले हैं। चित्रकारों की तुलिका ने सरसों के फूलों को नए आकर्षक अंदाज़ दिए हैं। फिल्मकारों, छायाकारों, माडलों ने सरसों की नयनाभिराम प्राकृतिकता को अपने कार्यक्षेत्र की  दिलकश पृष्ठभूमि बनाया है। सरसों के चिकित्सीय गुण भी कम नहीं हैं। इसमें प्रोटीन, कैल्शियम व फास्फोरस जैसे सभी महत्वपूर्ण तत्व होते हैं।
सातवीं सदी के उतरार्द्ध में हुए संस्कृत कवि बाणभट्ट के कादंबरी व हर्षचरित ग्रंथों के सन्दर्भों से पता चलता है कि उस समय सरसों के छोटे-छोटे दानों का बड़ा महत्व था जीवन के हर क्षेत्र में। बच्चे की रक्षा के लिए उसके तालु पर देसी घी की दो बूंदों के साथ पीली सरसों में मिली भस्म लगाने, मस्तक पर सरसों रखने, बाणभट्ट द्वारा अपनी शिखा में सरसों रखने का उल्लेख है। आंवला सरसों के तेल में भिगोकर, इस मिश्रण को माथे पर रगड़ने से जलन, सिरदर्द, बालों का गिरना रूकता है। यहां तक माना जाता है कि सरसों के तेल की मालिश स्फूर्ति के साथ-साथ विचारों को भी संयमित करती है। सरसों का विविध उपयोग चिकित्सा, धार्मिक, मांगलिक व अन्य कार्यों में होता रहा है और आज भी हो रहा है। तांत्रिकों ने भी सरसों का प्रयोग किया है। सरसों की चर्चा असीम है, बिल्कुल जीवन की रसीली उमंग की तरह आखिर सरसों वसंतवाहिनी जो है।