जल की लूट पर केन्द्र के बाद राज्य सरकार भी नींद में

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नहीं चेते, तो होंगे गंभीर परिणाम। गाजियाबाद से लेकर बनारस तक भूजल स्तर की हालत बेहद चिंता का विषय रोज बनती जा रही है। औद्योगिक ईकाईयों और पांच सितारा होटल आदि द्वारा बेरहमी से बिना इजाजत जिस तरह भूजल की लूटमार और बर्बादी हो रही है, ठीक इससे विपरीत कि कहीं भी वर्षा जल बचाने के लिए जमीनी शुरूआत नहीं हो रही है। भूजल विभाग की सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के अधिकांश जिलों में जल स्तर तेजी से नीचे जा रहा जिसमें मेरठ जिला अव्वल यानी 91 सेमी, गाजियाबाद दूसरे नंबर पर 79 सेमी. और नोएडा तीसरे नंबर पर यानी 76 सेमी. हर साल जल स्तर की गिरावट दर्ज की गई है। सूबे की राजधानी लखनऊ और प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की हालत भी बेहद चिंताजनक ही है। बात करें औद्योगिक शहर कानपुर व इलाहाबाद भी पीछे नहीं है। औद्योगिक इकाइयों द्वारा अत्यधिक भूजल दोहन और भूजल रिचार्ज सिस्टम के अभाव को ही जिम्मेदार माना गया है। मेरठ की घनी आबादी वाला ब्लॉक डार्क जोन है, जिले के पांच ब्लॉक रजपुरा, खरखौदा, माछरा, परीक्षितगढ़, मेरठ में क्रिटिकल पर वहीं दौराला और हस्तिनापुर ब्लॉक सेमी क्रिटिकल जोन में है। इससे पहले सूबे में चल रहे वैध अवैध बूचड़खाना अंतर्गत हो रहे गैरकायदे जलदोहन मामले पर दायर दो अलग अलग याचिका के जबाव में एनजीटी अदालत में रखी गई सीजीडब्लूए द्वारा जबावी पत्रावली में अलीगढ़, बुलंदशहर, गाजियाबाद और संभल जिले की भूजल स्थिति पहले ही गंभीर बताई गई है। अलीगढ़ के इग्लास व खैर क्रिटिकल जोन में वहीं चंदौस सेमी. क्रिटिकल ब्लाक में बताया गया। बुलंदशहर का गुलावटी व सिंकदराबाद क्रिटिकल जोन वहीं दानपुर, खुर्जा, शिकारपुर सेमी. क्रिटिकल जोन में बताए गए हैं, गाजियाबाद के भोजपुर, लोरी व रजापुर क्रिटिकल जोन में बताए गए, इसके अलावा संभल जिले का हाल और भी बदतर यानी बहजोई, बनलाखेड़ा, गुन्नौर, पवांसा व संभल क्रिटिकल जोन और असमौली व जुनावल सेमी. क्रिटिकल जोन में बताए गए हैं यानी संभल ऐसा जिला है जहां किसी भी ब्लाक की स्थिति ऐसी नहीं है जो बेहद चिंता का विषय से अलग हो। बात करें भूजल चिंतन की तो सुर्खियां बटोरने के लिए भले ही प्रधानमंत्री पर रोक लग जाए मगर जमीनी हकीकत यह कि हुक्मरान से लेकर अफसरशाही तक वर्षा जल बचाने की शुरूआत तक नहीं हुई। सूबे भर में हो रहे अंधाधुंध जल दोहन और जल व्यापार से राजधानी भले ही अछूती नहीं है मगर वर्षा जल बचाए जाने के लिए करोड़ो रूपया फूंके जाने के बावजूद उ.प्र. के 80 फीसदी जिला मुख्यालय ऐसे हैं जहां संयंत्र ही बूत बने हुए हैं। समस्या टीम ने इससे पहले छपे अंक में स्पष्ट खुलासा किया था कि जहां चाहो जमीन खोदकर जितने चाहे बोरवेल करके जितना चाहो पानी निकालो, बर्बादी करो भूजल विभाग के पास कार्यवाही तो दूर आंकड़ा तक नहीं है। मगर देश की एक उच्च न्यायालय द्वारा आए आदेश पालन पर गौर किया जाए तो जल भी एक प्राकृतिक संपदा है जिसे बचाना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।
यूपी के कुछ जिलों में गिरते जलस्तर की स्थिति
शहर                भूजल गिरावट
मेरठ                    91
गाजियाबाद            79
गौतमबुद्ध नगर        76
लखनऊ                70
वाराणसी               68
कानपुर                 65
इलाहाबाद              62
मुजफ्फरनगर          49
आगरा                  45
जौनपुर                 37

इसके अलावा आगरा शहर के कुछ ब्लाक अछनेरा, अकोला, बरौली अहीर, बिचपुरी, एतमादपुर, फतेहाबाद, फतेहपुर सीकरी, खन्दोली, सैंया, शमसाबाद, खैरागढ़, जगनैर क्रिटिकल जोन में और पिनहट, बाह, जैतपुर कला सेमी क्रिटिकल जोन में हैं।