उच्च न्यायालय पर बोझ बन गये यूपी के कुछ मुकदमेबाज विभाग

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कुल 9.13 लाख लंबित मामलों में 4.83 लाख मामले सिर्फ सरकारी विभागों से जुड़े

2.82 लाख मुकदमे लेकर खड़ा गृह विभाग तो सबसे बड़ा पैरोकारी हो गया 

सरकार चाहे तो चंद समय में हजारों मामले खत्म कर सकती है। मुख्यमंत्री भले ही प्रधान न्यायाधीश के सम्मेलन में उंगली उठाये कि अफसर रोज न्यायालय में तलब होंगे तो काम कौन करेगा। मगर हकीकत की एक तश्वीर यह कहती है कि हुक्मरान हों या अफसरशाही जनहित काम तो दूर फसाद बढ़ाने और बेईमानों को प्रोन्नत करने के सिवा कुछ नहीं करती। देश में लंबित तीन करोड़ से ज्यादा मामले के बोझ तले दबकर भले ही प्रधान न्यायाधीश रो पड़े। मगर हकीकत यह कि चिंतक पुरूष के रूप में जो दर्द न्यायमूर्ति के रूप में टी0एस0 ठाकुर के आंखों से बहे, उससे साबित हो गया कि देश में लगभग छः सौ तक पद सिर्फ न्यायमूर्तियों के भरे जाने में प्रधानमंत्री को कानून की साख बचाने के लिए तत्काल कार्यवाही की जरूरत है। झगड़े, बवाल, हत्या और जमीन-जायदाद के तमाम मुकदमे तो अदालतों के सिरदर्द बने ही हैं। मुकदमों के अंबार और उनके निस्तारण में देरी के लिए सरकारी महकमे भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। सरकार अफसरों से यदि अपनी ही मुकदमा नीति पर अमल करा ले तो काफी मुकदमे कम हो सकते हैं। बड़े पैमाने पर न्यायालयों में मुकदमे दाखिल होने से बचाए जा सकते हैं। प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट व इसकी लखनऊ पीठ में वर्तमान में 9.13 लाख से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं। इनमें 4.83 लाख सरकारी विभागों से जुड़े हैं। गृह, राजस्व, शिक्षा, शहरी विकास, पंचायतीराज, खाद्य रसद, स्वास्थ्य व सिंचाई महकमे तो मुकदमेबाज बनकर उभरे हैं। इनका कोई न कोई अधिकारी हर दूसरे-तीसरे दिन अदालतों में खड़ा नजर आता है। गृह विभाग इससे भी आगे है। इससे जुड़े 2.82 लाख मुकदमे हाईकोर्ट में विचाराधीन हैं। रोज ही बड़ी संख्या में पैरोकार कोर्ट-कचहरी में हाजिरी लगाते हैं। पर, सरकार चाहे तो यह स्थिति बदल सकती है। शासन के एक जिम्मेदार अधिकारी बताते हैं कि प्रदेश सरकार ने एक अच्छी मुकदमा नीति बनाई थी। इसमें लंबित वादों के निस्तारण और अनावश्यक मामले दाखिल होने से बचाने के लिए कई अहम दिशानिर्देश शामिल किए गए थे।