अफसरों की पहली पसंद अवैध बूचड़खाने

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शासनादेश जेब में! खूब चिढ़ाया जा रहा पर्यावरण कानून

दुधारू और गर्भवती पशुओं को काटकर व्यापार करने वाले बूचड़खाने बचाने के लिए उतरा गाजियाबाद प्रशासन 

(समस्या टीम)
क्या शासन स्तर पर बैठे कुछ अफसर दुकानदार हैं? या जिला शासन स्तर पर तैनात अफसरों पर भरोसा नहीं है?
सवाल सीधा है मगर जबाव कहीं नहीं है।
क्या जिला प्रशासन सरकार के दबाव में नहीं है? क्या जिला मजिस्ट्रेट भी निजी हित संवारनेके लिए काम करते हैं?
सवाल सटीक है जबाव किसी के पास नहीं!
अगर हां तो उच्चतम न्यायालय का आदेश पालन उ.प्र. राज्य में कतई नहीं हो रहा, कानून ने एक आदेश में स्पष्ट कहा कि अफसर जनता की शिकायतें सुनने के लिए, समस्याएं खत्म करने के लिए हैं सरकार के चापलूसी अथवा निजी हित संवारने के लिए नहीं।
बावजूद आलम यह कि सांस लेने वाली हवा और पीने वाला पानी दोंनो ही जहरीले और विषैले हो चुके हैं। यूं तो उ.प्र. राज्य में खासतौर पर शासन प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से वह न्यायमूर्ति भी सिकुड़ गए जिन्होंने सिर्फ दो साल में ही देश भर को चैकाया ही नहीं बल्कि स्पष्ट कर दिया कि नदियां और पेयजल दोंनो की पवित्रता पुराने दौर में फिर से खड़ी की जाएगी। मगर राष्ट्रीय हरित अधिकरण को भी कमजोर किया जाएगा, आदेश में छेद किए जाएंगे, यह करतब सिर्फ उ.प्र. राज्य ने ही सच करके दिखा दिया। कहने को यूपीपीसीबी प्रदूषण कम करने के लिए काम कर रही है मगर सच्चाई की एक तश्वीर यह भी है कि यूपीपीसीबी न सिर्फ परिवर्तन पुरूष कहे गए न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की खंडपीठ के आदेश ही छेददार बना रही है बल्कि जिलाधिकारियों को भी ठेंगा दिखाती है, बेइज्जत कर स्थानांतरण कराती है, यह हम नहीं बल्कि खुद व खुद सरकारी अभिलेख बताते हैं। दुधारू और गर्भवती पशुओं को काटकर मांस व्यापार करने वाले 6 से ज्यादा बूचड़खाने पर डंडा चलाने वाले जिलाधिकारी एस.बी.एस. रंगाराव को किस तरह दो साल पहले गाजियाबाद जिले से बाहर किया गया, किस तरह ईमानदार अफसरों को दर बदर किया जाता है, हम वहां नहीं जा रहे मगर यह सच है कि दो साल पहले ईमानदार आईएएस अफसर द्वारा गठित की गई दर्जन भर नेक अफसरों की टीम ने दूध का दूध पानी का पानी किया, पशुधन विभाग को रिपोर्ट भेजी कि गाजियाबाद में चल रहे बूचड़खाने न सिर्फ बंद करने की जरूरत है बल्कि प्रबंध तंत्र पर भी कार्यवाही किए जाना जरूरी है। बहरहाल देर आए दुरूस्त आए! एनजीटी के भय से भारत सरकार में उठापटक हुई तो यूपी की खबर ली गई, अवैध बूचड़खाने से संबंधित फाइलों पर विचार किया गया और गाजियाबाद के 7 में से 3 बूचड़खाने पर सख्त कार्यवाही करने के लिए 25 दिन पहले रिपोर्ट भेजी गई। बावजूद इंटरनेशनल एग्रो फूड और इंटरनेशनल एग्रो फूड (प्रोसेसिंग प्लांट) की कथित कार्यशैली में सुधार नहीं हुआ। यही नहीं एक जगह पर दो दो कंपनी के नाम पर न सिर्फ अपेड़ा को चिढ़ाया गया बल्कि भूजल कानून की दुर्गति की गई और यमुना नदी के अलावा क्षेत्रीय पेयजल पूरी तरह विषैला किया गया और किया जा रहा, बहरहाल अल नासिर एक्सपोर्ट की बात करें तो यह बूचड़खाना अकेला ही हिण्डन के माध्यम से यमुना नदी का दम घोटने के लिए ही काफी नहीं है बल्कि रेन्डरिंग प्लांट में टनो लकड़ी जलाकर जिस तरह हडडियों से चर्बी निकालने का कारेाबार किया जाता है उससे हवा भी पूरी तरह जहरीली की गई और की जा रही है। बात करें पेयजल की तो डासना क्षेत्र में चल रहे बूचड़खाने के चलते आस पास के गांव में पेयजल अशुद्ध हो चुका है, मांस के लौंदे और चीथड़े जो नाला में बहाए जाते हैं जिन्हें कुत्ते नोचते खाते हैं और इसी तरह की गंदगी जमीन के अंदर गहरे बोरवेल के माध्यम से गहराई तक पहुंचाई जाती है, इसके लिए यूपीपीसीबी और पशुधन विभाग दोंनो ही खासे मेहरबान हैं।
बहरहाल ये बोल और ऐसे सवाल समस्या टीम के नहीं हैं, यह पीड़ा जिलाधिकारी गाजियाबाद रहे श्री एस0वी0एस0 रंगाराव साहब की है, जिसे 24 जून 2014 के रोज पत्रांक संख्या 5297/जे0ए02 /जांच/2014 प्रमुख सचिव पशुधन विभाग उत्तर प्रदेश शासन को चिट्ठी के माध्यम से भेजी गई थी। चिट्ठी अकेली नहीं थी, पत्र में बहुत सारे अभिलेख दर्जन भर पी0सी0एस0 और गजिटेड अफसर के संयुक्त टीम द्वारा बनायी गई रिपोर्ट सहित यह लिखकर भेजा गया था कि गाजियाबाद जिले के डासना क्षेत्र में चल रहे जेवा एग्रो, अल-नफीस, ईगल काॅन्टीनेंटल ऐसे बूचड़खाने हैं जिन पर तत्काल प्रभाव से सख्त कार्यवाही करने की जरूरत है, ये बूचड़खाने चलाये जाने से बलबा हो सकता है, क्योंकि इन बूचड़खाना परिसरों में संयुक्त मजिस्ट्रेट, डिप्टी मजिस्ट्रेट, तहसीलदार, क्षेत्राधिकारी, यूपीपीसीबी अफसर और पशुधन अधिकारी की संयुक्त छापेमारी जो मध्य रात्रि लगातार 22 जून 2014 से लेकर तीन बार कराई गई, जिनमें हैरान करने वाली गतिविधियां देखी गईं, बूचड़खाना परिसरों में दुधारू और गर्भवती पशु काटे जाते हैं ऐसे पशु कहां से लाए जाते हैं, यह लेखाजोखा भी वधशालाओं के पास नहीं हैं, ऐसे बूचड़खाने क्षेत्रीय पेयजल को दूषित कर रहे हैं, ये बूचड़खाने जिस तरह की गंदगी बाहर बहाते हैं और परिसरों में जो गतिविधयां हसेती हैं उससे क्षेत्री जनता में बवाल हो सकता है, यहां तक कि ईगल कान्टिनेंटल बूचड़खाने ने 14 बीघा सरकारी जमीन भी कब्जा कर ली है, ऐसे बूचड़खाने तत्काल बंद किये जाने की जरूरत है और प्रबंध तंत्र पर कार्यवाही भी करनी आवश्यक है। खैर 2 साल बाद शासन से जबाव आया, क्या आया हम उधर भी नहीं जा रहे मगर निदेशक स्थानीय निकाय उत्तर प्रदेश शासन की चिट्ठी जो जिलाधिकारी गाजियाबाद के लिए 25 दिन पहले भेजी गई जिसमें स्पष्ट लिखा गया कि ऐसे बूचड़खाने के एनओसी और लाइसेंस रदद किए गए हैं, इन पर जिलाधिकारी गाजियाबाद द्वारा क्या कार्यवाही की गई, स्थानीय निकाय उ.प्र. शासन को भी अवगत कराया जाए। बावजूद 25 दिन गुजर गए और गाजियाबाद जिला प्रशासन की तरफ से क्या कार्यवाही हुई यह हकीकत लिखी जाए तो शर्म आ जाएगी। एडीएम की देखरेख में बूचड़खाना दिखवाए गए, लिखवाया गया कि बूचड़खाने में कुछ भी हेाता नहीं पाया गया, अब आप समझ लीजिए कि उस समय भी अफसर थे, आज भी जिलाधिकारी हैं- आज भी अफसर हैं। खैर स्थानीय निकाय निदेशक के पत्र संख्या तक0सेल/ 640/158(2)/2016 दिनांक 22 मार्च 2016 जो समस्या टीम के हाथ लगा, वह हकीकत आपके सामने रखी गई। अब समझिए वह पत्र संख्या-5297/जे0एस0-2, दिनांक 24.6.2014 जिसे प्रमुख सचिव पशुधन को पूर्व जिलाधिकारी एस.बी.एस. रंगाराव द्वारा भेजा गया था कि उक्त ईकाइयों पर कार्यवाही की जरूरत है बहरहाल मार्च 2016 अंतर्गत स्थानीय निकाय निदेशक द्वारा जिलाधिकारी विमल कुमार शर्मा मौजूदा अधिकारी को भेजा गया कि उक्त ईकाईयों पर अनापत्ति/ लाइसेंस निरस्त किये जाने की संस्तुति की गयी है। उक्त सम्बंध में अवगत कराना है कि दिनांक 18.3.2016 को भारत सरकार पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन द्वारा नई दिल्ली में एक बैठक आहूत की गयी तथा अवैध पशुवधशालाओं के विरूद्ध एक्शन टेकेन रिपोर्ट की सूचना से मा0 सर्वोच्च न्यायालय को शीघ्रताशीघ्र अवगत कराया जाना है। अतः अनुरोध है कि उक्त तीनों पशुवधशालाओं/ प्लान्टों के विरूद्ध की गयी कार्यवाही की अद्यतन सूचना/ आख्या से इस कार्यालय को अवगत कराने का कष्ट करें। अब आप समझ लीजिये कि पूर्व जिलाधिकारी एस0वी0एस0 रंगाराव की मेहनत और कार्यशैली की किस तरह दुर्दशा की गई है, पहले तो 22 महीने तक सुध नहीं ली गई, उच्चतम न्यायालय का चाबुक चला तो मार्च 2016 में कार्यवाही हेतु संस्तुति आई, वह संस्तुति भी किस तरह छेददार की जा रही है और इसका अंजाम क्या होगा यह समय बताएगा।

भूजल की दुर्गति, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कार्यवाही को जेब में डालकर टहल रहा संभल, बुलंदशहर, अलीगढ़ और गाजियाबाद प्रशासन अब भूजल कानून की दुर्गति करने पर आमादा हो गया है, सीपीसीबी ने मुख्य सचिव उ.प्र. को स्पष्ट लिखा था कि आॅनलाइन डिस्चार्ज और बेव कैम के अलावा एक भी बूंद गंदगी बाहर निकालने वाले बूचड़खाने तत्काल बंद किए जाने, 2015 के बाद ऐसे बूचड़खाने नहीं चलने चाहिए। यही नहीं सीपीसीबी ने अलीगढ़ ड्रेन के अलावा पेयजल के सैंपल की रिपोर्ट जो अदालत को दी है, वह उ.प्र. शाासन से लेकर प्रशासन तक के गले की फांस है बावजूद जिला प्रशासन अदालती कार्यवाही में झूठ की पोथी लिखने से बाज नहीं आ रहा। खैर भूजल कानून स्पष्ट है कि सिर्फ पीने का पानी ही बोरवेल से लिया जा सकता है, इसके अलावा किसी तरह का जल दोहन प्रतिबंधित है बावजूद उ.प्र. राज्य के 4 जिलों में चल रहे बूचड़खाने से संबंधित जो जल दोहन की स्थिति है वह इस प्रकार है-
(संख्या केएलडी यानी हजार लीटर रोज)
1. मैसर्स ईगल कान्टीनेन्टल फूडस प्रा0 लि0 700/400
2. मैसर्स अल-नफीस फ्रोजन एक्सपोर्टस 1000/600
3. मैसर्स अल-नासिर एक्सपोर्ट प्रा0 लि0 250/200
4. मैसर्स इण्टरनेशनल एग्रो फूड 1000/750
5. मैसर्स एम0डी0 फ्रोजन एक्सपोर्ट 120/50
6. मैसर्स इण्टरनेशनल एग्रो फूट (मीट प्रोसेसिंग) 120/50
7. मैसर्स करन फ्रोजन फूड, 100/40
8. मैसर्स जेवा एग्रो प्रा0 लि0 5