200 करोड़ के हैडपंप कब लगाएंगे नेता जी

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ओह! विधायक जी को याद नहीं रहा, प्यासे लोगों के लिए 40 हजार हैंडपम्प लगाने हैं

2 एमएलसी मिलाकर 11 विधायक हैं जौनपुर जिले में। शासन ने पहली बार फरमान जारी किया कि सिर्फ विधायक जी ही लगायेंगे 100 हैंडपम्प, यानी 11 विधायकों को 1100 हैंडपम्प लगाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। धूप ऐसी कि पानी कि जमीन तप गई, सरयू नदी सूख गई, पानी पाताल चला गया, हैंडपम्प कुछ पानी छोड़ गये, कुछ कई साल से खराब पड़े, पत्रकारों ने ध्यान दिलाया, तो विकास भवन से स्पष्ट हुआ, कि अभी तो किसी भी माननीय की तरफ से प्रस्ताव भी नहीं आया, कि हैंडपम्प लगाने हैं। खैर क्या विधायक जी चुनाव के समय ही दिखायेंगे शोपीस? क्या विधायक जी दूसरे साल की योजना भी एक साथ बांटेंगे? अगर नहीं तो एक विधायक के कोटे में आये लगभग 50 लाख के 100 हैंडपम्प कब लगेंगे? और अगर दूसरा वित्तीय वर्ष भी एक साथ किया जायेगा, तो क्या जनता को मिलेंगे पेयजल का जरिया हैंडपम्प अगर यह कहें कि विधायक जी बड़े कामों में लगे हैं, लिहाजा प्यासे लोगों की तरफ अभी ध्यान नहीं गया। तो ध्यान दिलाने की जिम्मेदारी किसकी है, उससे भी बड़ा सवाल यह कि बड़े काम जैेसे जमीन कब्जाना, अवैध अपार्टमेंट खड़े करना, इतने बड़े काम हैं कि गरीब और प्यासे लोगों की चिल्ल पोई ही नहीं सुनाई दे रही। अगर हां तो ऐसे में एक गम्भीर सवाल यह कि 6 करोड़ की विधायक निधि कितने मदों में खर्च हुयी? बहरहाल सूबे के 403 विधायकों को लगाने थे 40300 हैण्डपम्प, कहां गये? पता नहीं। क्या सभी विधायक भूल गये, अगर नहीं तो सम्भल, जौनपुर, हरदोई, शहजहांपुर, गाजियाबाद, बुलन्दशहर, अमरोहा, हापुड़, मुरादाबाद और बरेली कुछ ऐसे जिले हैं जहां ज्यादातर माननीयों ने हैंडपम्प नहीं लगाये। खैर माननीय तो व्यस्थता वश भूल गये होंगे, मगर अफसरशाही भी बड़े कमाल की फाइलें भरते हैं, जल निगम की मानें तो राज्य में 57 लाख हैडपंप लगे हैं। सूबे के कुल 822 ब्लाकों में लगे 57 लाख तक हैडपंप जनता को खूब पानी पिला रहे। जौनपुर जिले में ही एक लाख हैउपम्प लगे हैं बांदा, हमीरपुर, जालौन, ललितपुर, सहित तकरीबन बुन्देलखण्ड का आलम यह कि जो काम दस साल पहले हुआ, लोगों को वही हैडपम्प सही समय पर रिबोर भी मिलते रहें तो पेयजल की पूर्ति बहुत हद तक हो सकती है। बहरहाल बात करें सम्भल, अमरोहा, हरदोई, शाहजहांपुर, मुरादाबाद, हापुड़ और गाजियाबाद की तो यहां भी जल निगम की फाइलें पूरी तरह बेनकाब हो रही है। गौर करें तो संभल, असमौली, पवासां यानी बड़े तीन ब्लाकों में अलग अलग 2928, 2884, 3213 हैडपंप लगे होने की बात साल भर पहले कही गई थी जिनमें 600 से ज्यादा हैडपंप स्वयं अफसरशाही ने खराब और रिबोर के लिए हां की थी मगर पिछले दो साल से जिस तरह भूजल प्रदूषण ने डंक मारा है, भूजल की स्थ्तिि निरंतर गिर रही है, ऐसे में माननीय महिला हों या पुरूष मगर जिनके कंधे पर पेयजल की जिम्मेदारी दी गई है, वह कहीं भी निष्ठापूर्वक पूरी नहीं की गई, साथ ही जलनिगम कहीं एक लाख, किसी जिले में पचास हजार हैंडपम्प की दावेदारी कर रहा हैं, वह भी छेददार ही है।

समस्या टीम की खबर पर ऐसा संज्ञान कि रोगी बने कैदी विधायक अस्पताल से दौड़कर मुरादाबाद जेल पहुंच गए। जेलर प्रदीप भदौरिया ने उस्मानुल हक को अंदर उनके वार्ड में भेज दिया है मगर दबी जुबान में अफसरों ने माना है कि जेलों में दुर्दशा की कमी नहीं है! पहले तो मुरादाबाद, संभल और अमरोहा यानी तीन जिलों को झेल रही मुरादाबाद जेल के पास सिर्फ 32 लोंगो का स्टाफ है वहीं 511 कैदी की क्षमता वाली जेल में 2900 कैदी रखे गए हैं। अब आप समझ लीजिए कि जेलों की दुर्दशा पर सरकार कितनी चिंतित है यही नहीं यह आलम उस समय भी रहा जब उ.प्र. में जेल मंत्री का पद पूर्व कैदी रहे राजा भइया के पास रहा। यूं तो जेलों की व्यवस्था और जिम्मेदारी के लिए अलग अलग महानिरीक्षक और महानिदेशक कारागार हैं मगर जेलों की दुर्दशा के लिए कौन कितना चिंतित है यह पिछले साल मेरठ के अलावा गाजियाबाद जेल से ही साबित हो गया था। भ्रष्ट अफसरशाही को भले ही राज्य की जेलें नहीं सुहाती, मगर माननीयों को सूबे के अस्पताल खूब लुभा रहे हैं। भले ही उत्तर प्रदेश राज्य की ज्यादातर जेलों में सर्व व्यवस्था संपन्नम! फिर भी नेता जी अस्पताल और खासतौर पर महिला वार्ड ही चुनते हैं। अभी तक तो खूंखार कैदी नेता ही अस्पतालों से प्रेम करते थे मगर अब तो छुटभईया नेता भी जेल परिसरों से ऊब गए हैं। अभी तक चर्चित जेल नयनी (इलाहाबाद) आगरा, मेरठ, लखनऊ बरेली और गाजियाबाद जेलों से खतरनाक धाराओं में जकड़े कैदी नेता अस्पतालों में आराम फरमाते रहे मगर अब तो एटा, फतेहगढ़, आजमगढ़ और मुरादाबाद के अस्पताल कैदी सफेद पोश को खूब भाते हैं। उदाहरण के लिए लखनऊ, गोरखपुर और इलाहाबाद बहुत काफी है, यूं तो उस्मानुल हक मुरादाबाद भी अस्पताल के महिला वार्ड पर लदे रहे मगर प्रशासनिक और मण्डल स्तर के अफसरों ने उस्मानुल हक को आज 02 मई के रोज बापस वहीं भेज दिया जहां उनकी जगह थी। यूं तो उ.प्र. राज्य में पिछले 9 साल से 27 से ज्यादा ऐसे कैदी नेता बेनकाब हुए, कैमरे में कैद हुए जो गंभीर धाराओं में जकड़े होने के बाद अदालत द्वारा कैदी घोषित किए गए मगर अस्पतालों में लाव लश्कर सहित आराम फरमाते देखे जाने के बावजूद शासन और जेल प्रशासन एक चलन समझकर नजरअंदाज करता रहा मगर यह चलन और सफेदपोश का तांडव में कमी आएगी यह मुरादाबाद से साबित हो गया।