जनता का हथियार तो छीन लेने पर आमादा है माननीय

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शैलेश सिंह
ग्राम सभा तो नहीं चमका पाए, मगर बदूक तानकर जरूर खड़े हो गए। क्या आरटीआई कानून खत्म कर देंगे नेता? क्या जनता को मिला हथियार छीन पायेंगे सफेद पोश? खैर प्रधानमंत्री के सिवा किसी ने नहंी चमकाई गोद ली हुई ग्रामसभा मगर आरटीआई कानून में छेद करने के लिए तंबू सजने लगे हैं। आर0टी0आइ0 कानून या जनता का हथियार! क्या 4835 सभी माननीय डरने लगे सच से? या अपराधिक छवि के 1448 से ज्यादा नेताओं को ही सता रहा कानून? खैर उच्चतम न्यायालय ने आरटीआई कानून को बल क्या दिया, कुछ माननीय बंदूक तानकर खड़े हो गए। राजनैतिक दल आए दायरे में, नेताओं की खुलने लगी पोल अफसरशाही और हुक्मरानों की बेइमानी अदालती कटघरे तक पहुंच गईं फिर क्यों घबराए नेता खत्म करना चाहते हैं आरटीआई कानून। देश भर में कहीं भी आरटीआई कार्यकर्ता बेइमानी के आरोपी नहीं, कहीं भी अदालती हण्टर नहीं चला फिर बड़बोले नेताओं ने कानून कुचलने की दुकानें क्यों सजा लीं। यूं तो 400 से ज्यादा खुलासा पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ता मौत के घाट उतारे गए, प्रताडि़त किए गए घर और जिला छुड़ा दिए गए, यहां तक कि उ.प्र. राज्य में दर्जन भर से ज्यादा पत्रकार मार दिए गए, जिंदा जलाए गए, रोड दुर्घटनाएं कराईं गईं यहां तक कि यूपी विधानसभा तो इस तरह बेनकाब हुई कि मुजफ्फरनगर दंगा मामला में पोल खुल जाने के भय से चलाया गया दमन चक्र पर उच्चतम न्यायालय को पानी फेकना पड़ा, फिर क्यों आदत से बाज नहीं आ रहे नेता, यह सवाल ऐसा है जिसका जबाब सिर्फ जनता के पास है। बहरहाल पहले ही माननीयों ने आरटीआई कानून का दम तोड़ने में कसर नहीं रखी, कई राज्य तो ऐसे रहे जहां सालों साल आयुक्त का पद ही खाली रहा! फिर भी कानून के चलते बड़ी बड़ी वह राजनैतिक हस्तियां और अफसरशाही बेनकाब हुईं जिससे देश भर में खलबली मच गई। खैर 2 लाख से ज्यादा मामले आरटीआई कानून के तहत लंबित है मगर यह तादाद घटने के बजाय आंधी की तरह बढ़ रही है। यूं तो आरटीआई कानून दस साल से बड़ा हो गया है मगर 2014 तक जनता को सिर्फ 23 सूचना आयुक्त ही मिले थे। बात करें लंबित मामलों की तो आंकड़ा कहीं आगे है जिनमें सबसे ज्यादा दैनीय स्थिति यूपी, बिहार, म.प्र. और राजधानी दिल्ली की है खैर 48 हजार से ज्यादा मामले यूपी में, 32 हजार से ज्यादा म.प्र. में और 26 हजार से ज्यादा केस केन्द्र में लंबित हैं।