संकट में मसीहा कौन? आईपीएस या आईएएस

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शैलेश सिंह

संकट में मसीहा कौन? आईपीएस या आईएएस कुनवा। जहां पुलिस एक तरफ भूख प्यास मिटा देने का दम खम भर रही, वहीं दूसरी तरफ आईएएस एक दो नहीं कुनवा का कुनवा सोया हुआ है, अगर कहें कि जिस पुलिस के पास किसी तरह का राहत बजट नहीं, वह पुलिस भूखी प्यासी जनता का पेट भरने में जुटी है, यहां तक कि खुद भूखी प्यासी पुलिस मतलब आईपीएस से लेकर सिपाही तक भूख से बिलखते लोंगो की भूख मिटाने के लिए अपना टिफिन खोल दे रही है, दिल्ली, यूपी, बिहार, मध्यप्रदेष, जैसे राज्य मिसाल बन रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ 12 से ज्यादा बड़ी सरकारी योजनाओं पर लदे आईएएस अफसर आपातकाल में भी मिसाल नहीं बन पा रहे, अगर कहें कि यहां सरकारी राषन मतलब खाद्यान्न आयुक्त ही अकेले नहीं हैं, यहां पोशाहार निदेषक ही अकेले नहीं हैं, यहां मध्यान्ह भोजन सचिव ही अकेले नहीं हैं, यहां आपदा राहत, एमपी एमएलए फंड राहत, उत्पीड़न राहत, बीमारी और महामारी राहत, वृद्ध, विकलांग, अपाहिज, बेसहारा पुर्नवास राहत जैसी लगभग 18 से ज्यादा बड़ी योजनाओं के बावजूद जिलाधिकारी से लेकर षासन में बैठे वरिश्ठ आईएएस अफसर तक नकारा साबित हो रहे हैं, और यही हाल कमोबोष केन्द्रीय अफसरों का है, यह गलत नहीं होगा। पढ़कर तो अजीब लगेगा! मसला भी सिर्फ दिल्ली, यूपी, मध्यप्रदेष और बिहार का ही नहीं है बल्कि देष भर का है। जहां एक तरफ देष का प्रधानमंत्री दुनिया को दिषा दिखा रहा, भारत को नई पहचान देने में जुटे हैं, वहीं दूसरी तरफ आपातकाल के समय में भी आईएएस अफसर न तो अपनी नींद से जाग रहे, न ही अपनी नाकामी छुपाने के लिए बेषर्मी दिखाने से बाज आ रहे हैं। जबकि एक एक जिले में करोड़ो का बजट कई तरह का पैसा खपाने की जिम्मेदारी सिर्फ डीएम की है। खैर घर में रहो! घर में रहो, किसके घर में रहें? कहां झोपड़िया है? क्या खाएं? क्या पिएं? यह पीड़ा हरण करने वाले न जाने क्या पिए पड़े हैं। यह हाल उस समय है जब देष का मुखिया मोदी है और भरण पोशण कराने वाले सन्यासी, मतलब योगी जैसा मुख्यमंत्री है। तो क्या सिस्टम अपनी मनमानी से बाज नहीं आएगा, अगर कहें कि न इंसान की चिंता, न इंसानियत जगाने की षुरूआत तो 100 फीसदी सही है और सिस्टम ने दिखा दिया कि सरकारी रकम से एक एक पाई का भोग करना जिंदा लोंगो के लिए नहीं सिर्फ मुर्दा….। न निगम के तंबू, न विकास प्राधिकरण की व्यवस्था, यहां तक कि जिलाधिकारी पूरे षुभांल्लाह। तो क्या पोशाहार की पोल खुल सकती थी? क्या सरकारी राषन खत्म हो जाने का डर है? और क्या दरिद्रता खत्म होते ही दुकानदारी में आग लग जाएगी? अगर हां तो क्या डीएम राहत कोश कोई और चट कर गया। खैर न सरकारी गेस्ट हाउस की कमी, न सरकारी स्कूल काॅलेज के प्रांगण, न सरकारी भवनों की कमी, न ही अफसरों का टोटा, इसके बाद भी देष की आत्मा भटक रही है, खुद को जमीन पर बोझ समझ रही है, षायद इसके लिए वह घटिया सोच जिम्मेदार है और इस सोच में वह आईएएस अफसर सने हैं जो 12 बीघा के आलीषान भवनों में, आलीषान गाड़ियों में रहने के आदी, मतलब जिसके पैर नहीं बिमाई वो क्या समझे पीर पराई। बहरहाल एक तरफ 23 मार्च से देष में आपातकाल घोशित है, आपात कानून लागू हैं, मोदी जैसा मुखिया, योगी जैसा मुख्यमंत्री महामारी से लड़ने में जुटे हैं, आवाम को हर संकट से बचाने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ हजार दो हजार नहीं लाखों लोंगो की भूख, प्यास मिटाने, इन्हें संभालने, रोकने, पेट भरने, स्वास्थ्य परीक्षण कराने आदि जिम्मेदारियां निभाने वाले भटके हुए देखे गए। यूं तो लाखों की भीड़ में वह भी रहे जिनके नीचे छत नहीं है, ऐसे भी रहे जो कैंसर, टीबी, सांस या अन्य बीमारी से पीड़ित हैं, एम्स जैसी तमाम संस्थाओं से निकाले गए हैं मगर इस झुंड के झुंड में ज्यादातर वह बंधुआ व देहाड़ी मजदूर भी रहे जो अनपढ़ हैं और जिन्हें महामारी का ज्ञान नहीं है, जिन्हें सिस्टम से अपना हक मांगने की जानकारी नहीं है, संकट के समय देष का सहयोग करने का ज्ञान नहीं है।