भूजल कानून की दुर्गति कर रहीं एजेंसियां

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शैलेश सिंह

पांच सितारा होटल, तरणताल और अवैध बूचड़खानो में सबसे ज्यादा जल बर्बादी
जहां चाहो खोद डालो जमीन! जितने चाहो बोरवेल अथवा ट्यूबवेल! बेहिसाब भूजल से व्यापार करो, या बर्बादी! कोई पूछने वाला नहीं, अगर यह कहें कि सिर्फ भूजल प्राधिकरण के अफसर ही भूजल कानून पर बोझ हैं, तो कतई गलत नहीं होगा, हालांकि कुछ अफसर ईमानदारी और निष्ठा से पानी बचाने की कोशिश करते हैं, अदालत के सामने विभागीय कमी पूरी करने की कोशिश भी करते हैं मगर ऊपर बैठे कुछ आकाओं के चलते भूजल विभाग की फजीहत और पेयजल की बर्बादी थमने का नाम नहीं ले रही। उच्चतम न्यायालय ने जनवरी 1997 में आदेश दिया था कि बेहिसाब जल दोहन पर पाबंदी कानून की रखवाली सिर्फ सीजीडब्ल्यूए की है, बावजूद प्राधिकरण के अफसर जल दोहन की लूट करने वाले होटल, स्टील प्लांट, भवन निर्माता, तरणताल और बूचड़खाने आदि के रजिस्ट्रेशन कर्ता की हैसियत तक ही सिमटे बटुरे है, कहां कितने पानी की लूटमार हो रही है, अफसरों को कतई फिक्र नहीं है, हालांकि प्राकृतिक संपदा जिसमें भूजल शामिल है, पर केरल हाईकोर्ट द्वारा पारित हुआ कोकाकोला मामले में एक ऐतिहासिक फैसला जिसमें राज्य सरकार की जवाब देही निश्चित की गई है, मगर सुप्रीम पावर ने भूजल मामले पर देश भर में सिर्फ सीजीडब्ल्यूए को जिम्मेदारी सौपी है। हम आपको बता दें कि पिछले दो दशक से बेहिसाब जल दोहन की लूट का दंश झेल रहे देश भर के ज्यादातर राज्यों पर भूजल प्रदूषण का दुस्प्रभाव बहुत ही हैरान करने वाला साबित हो रहा है, शहर के लेकर गांव तक भूजल भंडार या तो खत्म हो गये, या सूखने की कगार पर आ गये, खासतौर पर उत्तर प्रदेश राज्य में इसका दुस्प्रभाव सबसे ज्यादा होते हुए भी यहां गंगा, यमुना, रामगंगा, सरयू, घाघरा, शारदा जैसी नदियां पेयजल की पूर्ती के लिए जीवन दायिनी बनी हुयी हैं, मगर यह अफसोस ही कहा जा सकता है कि वर्षारितु के अलावा देश की सबसे बड़ी अदालत एनजीटी भी इसे पुराना रूप दिलाने के लिए पूरी तरह इसलिए विफल हो रही है क्योंकि सरकारी एजेंसियां सिर्फ और सिर्फ शिकायत कर्ताओं के लिए काल और दोषी इकाइयों के लिए अर्दली के रूप में काम कर रही है, अदालती लड़ाई के दांव पेंच के चलते केन्द्र और राज्य सरकारें न सिर्फ कानून को ही मुंह चिढ़ा रहीं बल्कि नदियों को पिछले तीन साल से दूषित होने का आंकड़ा बढ़ाने का सर्टिफिकेट स्वंय सीपीसीबी जारी कर रही है, नाला के माध्यम से छोड़ा जाने वाला गंदा पानी से न सिर्फ नदियां दूषित हो रहीं बल्कि सूबे भर में कुदरती पानी भी दूषित हो चुका है। बात करें भूजल प्राधिकरण की तो यहां अफसर सिर्फ रजिस्ट्रेशन करने के बाद सालों साल पोथी सम्हालने तक ही सिमटे बटुरे रहते हैं। अगर यह कहें कि पानी बचाने के लिए काम कर रहा भूजल विभाग को विभागीय नियमावली ही नहीं मालूम, तो गलत नहीं होगा। भूजल कानून क्या है? देश में कितने जिलों की जमीन जल विहीन है? प्राधिकरण की जिम्मेदारी जमीन पर क्या है? इकाइयां अथवा सरकारी भवनों में वर्षा जल बचाने के लिए कब प्रयास होंगे, पर्यावरण कानून के अनुसार ये कुछ वो सवाल हैं जिन्हें सीजीडब्ल्यूए के अफसर जमीन पर तो दूर अदालती कार्यवाही के बाद भी पूरा करने के प्रयास नहीं करते।
नतीजा यह कि देश की राजधानी दिल्ली और आसपास के बाहरी जिले फरीदाबाद, गुड़गांव, नोएडा और गाजियाबाद का पानी सबसे ज्यादा दूषित हो गया है। अगर यह कहा जाये कि सिर्फ अदालती हंटर से बचने के लिए ही भूजल अफसर सिर्फ कागजों में खानापूर्ति करते हैं, तो भी गलत नहीं है। उदाहरण के लिए 1999 से डार्क जोन गाजियाबाद जिला की स्थिति आज 15 साल बाद ओवर एक्सप्योटिड और भूकंपित क्षेत्र में बदल जाने के बावजूद इस जिले के 40 से ज्यादा स्टील प्लांट, पेपर मिल, होटल, भवन निर्माता और खासतौर पर बूचड़खाने भूजल की बर्बादी और यमुना नदी को सीवर में बदल दिये, यह तो सीपीसीबी एवं सीडब्ल्यूसी के अफसरों ने पिछले तीन साल में निरंतर साबित कर दिया।

इतने गिर जायेंगे यूपीपीसीबी के अफसर?

शिकायतकर्ताओं के लिए दुश्मन तो दोषी इकाइयों के लिए अर्दली की भूमिका में काम कर रहे यूपीपीसीबी के अफसरों को बोर्ड द्वारा तय की गई नियमावली बचाने की भी जानकारी नहीं है। उद्योग परिसर से बाहर छोड़ी जाने वाली गंदगी के लिए नियमावली तो 2 दर्जन से ज्यादा भरी जाती है, मगर किसी भी उद्योग से निकलने वाली गंदगी का हर महीने भजे जाने वाला रिकाॅर्ड न इकाइयां रखती हैं, और न ही अफसरों को याद करने की भी जरूरत। अगर यह कहें कि यहां कुछ अफसर इतने गिर सकते हैं कि मरे हुये लोगों के नाम का हलफनामा अदालत में देकर भी बूचड़खाने और मांस गोदाम चलवा सकते हैं, तो कतई गलत नहीं होगा। उदाहरण के लिए एनजीटी में निस्तारित एक मुकदमा जो 2016 की याद दिलाता है, उसकी अगर सीबीआई जांच कराई जाये तो न सिर्फ एजेंसियों के ही अफसर बल्कि इस मामले में फर्जी हस्ताक्षर और सुनियोजित प्लान बनाकर अदालत में धोखाधड़ी करने वाली कई हस्तियां भी फंस जायेंगी।

जल बिन कल क्या?
पांच लाख लीटर पानी की अहमियत क्या है? लातूर में प्यासे बिलखते मासूम और बुजुर्गो को देश भर ने देखा, तीन दिन बाद भी गला सींचने वालों तक पानी मुहैया उस समय नहीं हो पाया जब केन्द्र से लेकर राज्य सरकार तक हर एजेंसी ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। हालांकि इससे कम दयनीय स्थिति बुंदेलखण्ड के 7 जिलों, महाराष्ट्र के 3, मध्यप्रदेश के 9 और छत्तसीगढ़ के 6 जिलों में नहीं है बावजूद इन जिलों में भी उद्योग के नाम पर जमीन की कोख सुखाने वालो पर सीजीडब्लूए, सीपीसीबी और राज्य प्रदूषण एजेंसियां खासी मेहरबान उस समय हैं जब पर्यावरण कानून बचाने के लिए, भूजल की बर्बादी रोकने के लिए, पानी ेकी शुद्धता और नदियों को पुराना जीवन देने के लिए एनजीटी देश भर के उद्योगों के अलावा राज्य एंव केन्द्र सरकार पर कोड़ा लेकर सवार है।