लोंगो की कब्र पर औद्योगिक विकास किसके लिए?- एनजीटी

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समस्या टीम। इंसान को मारकर औद्योगिक विकास किसके लिए? लोंगो की कब्र पर उद्योग बढ़ाने की इच्छा क्यों? न सांस लेने के लिए हवा सुरक्षित बची, न पीने लायक पानी। 13 जिलों का भूजल खत्म, और 11 जिलों के पेयजल में नाइट्रेट या फ्लोराइड। इसके बाद भी निगरानी करने की इच्छा नहीं जाग रही जबकि हवा, पानी की गुणवत्ता बिगाड़कर औद्योगिक विकास नहीं करना चाहिए, लिहाजा निर्देश दिया जाता है कि निरीक्षण व्यवस्था मजबूत की जाए, आधुनिक लैब बढ़ाई जाए, देश भर में निगरानी करने के लिए तत्काल एंव पर्याप्त भर्तियां की जाएं, अगली सुनवाई से पहले आदेश पालन होने की रिपोर्ट एनजीटी को दी जाए। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया गया कि आधुनिक लैब बनाने, निरीक्षक एंव एक्सपर्ट की भर्ती करने की जिम्मेदारी सीपीसीबी की होगी और सरकार का कोई भी विभाग इसमें दखल न दे। एक पत्रकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल की खंडपीठ ने सिस्टम को आड़े हाथों लिया और जन सेहत पर अहम फैसला सुनाते हुए पीठ ने मुख्य सचिव हरियाणा से लेकर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, सीपीसीबी एंव सीजीडब्लूए के लिए अलग अलग निर्देश जारी किए। स्थापना एनओसी एंव कंसेन्ट के विवरण पब्लिक डोमेन में लाएं जाएं ताकि वैध अवैध इकाइयों की जानकारी आम जनता को भी हो सके, निगरानी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाई जाए, मनमानी करने वाली इकाइयों को तत्काल बंद किया जाए। इसके अलावा सीपीसीबी के हिसाब से तय जुर्माना वसूला जाए। याची शैलैश सिंह ने अपनी याचिका में मांग की थी कि मात्र 3 जिलों की 91 बड़ी इकाइयां अंधाधंुध जल दोहन कर रहीं जबकि 13 जिलों के भूजल भंडारण भी खत्म हो चुके हैं, और ऐसी इकाइयों के पास सीजीडब्लूए से एनओसी भी नहीं है, याचिका में मांग की गई कि आधे राज्य की भूजल गुणवत्ता बिगाड़ी जा चुकी है, जनता दूषित जल पी रही, आगे यह भी मिलना असंभव लग रहा जिसकी वजह सिर्फ इकाइयों की मनमानी है। सीजीडब्लूए, सीपीसीबी, राज्य प्रदूषण और सीएजी के अहम दस्तावेजों का सहारा लेकर याची ने अदालत से विनती की कि इकाइयों की मनमानी और सिस्टम की कागजी कार्यवाही एक जैसी हैं, और यह सच कोर्ट को बताने के लिए सीएजी रिपोर्ट की मदद ली गई, इस परसुनवाई करते हुए अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि याचिका में लगाए गए आरोप सत्य हैं जबकि मुख्य सचिव हरियाणा की रिपोर्ट और भी बदतर हाल बताने के लिए काफी है, मुख्य सचिव ने अपने जबाब में स्पष्ट किया कि इकाइयों की निगरानी 5 साल एंव 7 साल में एक ही बार की जाती है और यही हालात 19 राज्यों के हैं, इसके अलावा सीजीडब्लूए की रिपोर्ट में कहा गया कि 11 जिलों से 401 भूजल नमूना लिए गए जिनमें 224 नमूने खराब हैं, पानी पीने योग्य नहीं बचा। लिहाजा एनजीटी ने अलग अलग एजेंसियों, सरकार को अलग अलग निर्देश जारी करते हुए इकाइयों की निगरानी तिथि में खासा कटौती की है, 17 श्रेणी के उद्योगो में 3 महीने में एक बार, लाल श्रेणी के उद्योगों में 6 महीने, औरेंज कैटेगरी की इकाइयों में 1 साल और ग्रीन कैटेगरी में 2 साल का समय तय किया है। अदालत ने अपने आदेश में मुख्य सचिव हरियाणा को निर्देश दिया कि लोंगो को शुद्ध पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी, अगली सुनवाई से पहले भूजल गुणवत्ता में सुधार लाने और इसके लिए हर संभव उपाय कामयाब करने की जिम्मेदारी मुख्य सचिव की होगी। ट्ब्यिूनल ने कहा कि हवा और पानी की गुणवत्ता के संबंध में केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सुनिश्चित करें कि सभी राज्यों के नीतियों में संशोधन किया जाए। नीति में जल प्रदूषण रोकथाम एंव नियंत्रण अधिनियम 1974 और वायु प्रदूषण रोकथाम एंव नियंत्रण अधिनियम 1981 के तहत निरीक्षण का प्रावधान हो। इस संबंध में कार्यवाही रिपोर्ट अगली तारीख से पहले ईमेल के जरिए दाखिल की जा सकती है।