आगरा, लखनऊ कहीं आईये! बीमारी मुफ्त मिलेगी

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अदालती कार्यवाही भी छोटी पड़ गई

तीन मुख्यमंत्री, ग्यारह नगर आयुक्त, चार प्रमुख सचिव आये गये, टी0टी0जोन के नौ पहरेदार कागज भरते रहे, फिर भी अफसरों ने लखनऊ, आगरा में जमकर गन्ध फैलाई

काबिल अफसर या ईमानदार हस्तियां संवारेंगी यूपी? नहीं काबिल अफसरों ने तिजोरी ही नहीं लूटी, जनजीवन तहस-नहस कर दिया, अगला निशाना सृष्टि की तरफ है। क्या सरकार नदियां और पानी नष्ट कर देगी? क्या सरकारी योजनायें ही बचेंगी प्यास बुझाने को? पढ़कर तो अजीब लगेगा, मगर हांफती हवा, कांपता जल की स्थिति अदालतें भी समझती हैं, बावजूद स्थिति हर साल ही नहीं, हर महीने, आये दिन बिगड़ती जा रही। यूं तो दिल्ली से आगरा तक दम तोड़ चुकी यमुना हुक्मरान और अफसरशाही की आमदनी का जरिया बनी हुई है, जैसा विकास है, वह स्पष्ट दिखता है कि क्या केन्द्र और दिल्ली सरकार धरती से नदियां नष्ट करने पर आमादा है, अगर नदिया नष्ट होती नहीं बचीं तो सृष्टि की प्यास सरकारी योजनायें बुझायेंगे, यह हम नहीं कह रहे यह गंगा यमुना की दशा स्वंय बोलती है, काशी, इलाहाबाद, बरेली, आगरा, गाजियाबाद शहर और यमुना गंगा की हकीकत देखकर बेजान भी समझ सकता है, मगर भारतीय संविधान और इसका पर्यावरण संरक्षण कानून जिस दिशा में जा रहा है, बजट खर्ची के बावजूद जो स्थिति बच रही है, और अदालती कार्यवाही के बाद के हालात हैं, आम खुद समझ सकते हैं, खैर फिलहाल हम नगर निगम आगरा और लखनऊ के विकास की तरफ आपको लिये चल रहे हैं। दस साल तक लगातार डाका पड़ा, तीन तीन मुख्यमंत्री आये गये, कोई नहीं बोले। लखनऊ संवारने के लिये 2000 करोड़ रूपये दिये गये, मगर अफसरों और ठेकेदारों ने सिर्फ गंद फैलायी, जनता को मिली तो सिर्फ हांफती हवा, कांपता जल। यही नहीं बारिश आने से पहले से डरते हैं लखनऊवासी, क्योंकि न जाने कब सीवर नाला और गोमती नदी एक हो जायें और गली मौहल्ला सब ताल तलैया में बदल जायें, बहरहाल कौन है एसएसजी बिल्डटैक, किसने 2007-08 से अब तक लगातार डकैती डाली, खैर पर्यावरण के नाम पर 2000 करोड़ रूपये खर्च किये गये, मगर जेएनएनयूआरएम की रकम बाढ़ का पानी समझकर खर्च की गई, 05 नगर आयुक्त, 04 सचिव और तीन मुख्यमंत्री आये गये, मगर राजधानी की दुर्दशा किसी को नहीं दिखी, खैर लखनऊ भर का जल भराव, सीवर निर्माण, कूड़ा उठान, और निस्तारण जैसी जरूरी सुविधायें देने के नाम पर सिर्फ लखनऊ में 2000 करोड़ रूपये बर्बाद किये गये, मगर सीएजी रिपोर्ट नजरअंदाज की गई, योगी शासन बौना रह गया ये हैरानी की बात है। यही नहीं बात करें आगरा की तो टी0टी0जोन की निगरानी उच्चतम न्यायालय कर रही, 09 विभागीय औहदेदारों की पहरेदारी है, मण्डलायुक्त अध्यक्ष हैं, मगर अध्यक्ष महोदय के काम और निगरानी दोनों ही घटिया हैं, कानून के विपरीत हैं, चापलूसी भरे हैं, यह देखने वाला कोई नहीं। खैर 2007-08 में आगरा शहर के लिये दिये गये 740 करोड़, मगर सभी 04 काम चैपट रहे, अलाभकारी रहे, दस साल तक यह आलम चलता रहा, आज भी वही हाल है, यह हैरानी की बात है और यह समस्या टीम नहीं कह रही, यह हकीकत है सीएजी जांच की। जून, जुलाई 2014 में सीएजी हुयी, अफसर, सरकार, भारत सरकार, सभी को सचेत किया गया, मगर निदासे हुक्मरान नहीं जागे। मई 2017 में सीएजी हुयी, निगम अफसरों से लेकर शासन तक की गतिविधियां सामने रखी गईं, कमिश्नर जैसे अफसरों की जालसाजी बताई गई, मगर मण्डलायुक्त महोदय के सामने उत्तर प्रदेश शासन ही नहीं, भारत सरकार भी बौना साबित हुआ।
सभी परियोजनाएं 2012-13 तक हितकारी होने के करार के साथ किस तरह उ0प्र0 सरकार ने दरिद्रता और गन्ध फैलाई, किस तरह पर्यावरण कानून का गला घोंटा गया, कैसे उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी हुए जरूरी निर्देश दफन किए गए, यह समझने के लिए आपको ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी। 2007-08 से 2 मुख्यमंत्री आए गए, 7 से ज्यादा नगर आयुक्त और 4 प्रमुख सचिव शासन कागज भरते रहे, फिर भी अफसरों ने आगरा शहर में जमकर गन्ध फैलाई। किस तरह आगरा वासी चिढ़ाए गए, राज्य एंव भारत सरकार की आमदनी का जरिया मेहमानों (देशी विदेशी पर्यटक) को क्या क्या मुफ्त बांटा गया, यह समझने के लिए ज्यादा मशक्कत नहीं करनी होगी, सिर्फ आप पिछले 10 साल का विकास जानिए, वह भी सिर्फ 1 विभाग का! नगर विकास भारत सरकार ने दी 74071 लाख रकम! 4 मदों में होना था 2012-13 तक काम फतह! 10 साल बाद जांच में क्या मिला सिर्फ गंन्ध! तो कहीं विकास का पुतला! पहला काम कि जांच टीम भारत सरकार ने पाया कि आगरा नगर निगम ने 67689 लाख कहां खर्चे, किस अफसर ने हस्ताक्षर किए, सब कुछ सफा चट्ट मिला, यानी गोलमाल!
दूसरा काम- घर घर कूड़ा उठान और कूड़ा निस्तारण पर 3083 लाख सारा स्वाहा मिला! मगर जमीन पर प्लांट का पुतला ही मिला, वो भी बजबजाते कूड़े से गगनचुंबी पहाड़ की तरह, जबकि सारा शहर भी जगह जगह कूड़े से पटा मिला अलग से, शहर के 2 बड़े हिस्सों में कूड़े के आसमान छूते ढेर, आवाम और मेहमानों को चिढ़ाने के लिए मौजूद मिले।
तीसरा काम- 603 लाख की रकम से कूड़ा उठान वाहन खरीददारी बी.एस.4 वाहन के बजाय बी.एस.3 वाहन खरीदे हुए फर्राटा भरते दिखे, यही नहीं जिस कंपनी से बी.एस. 3 वाहन खरीदे गए वहां बी.एस.4 वाहन मौजूद थे यानी जानबूझकर बड़ी अदालत के आदेश की परिभाषा बदली गई जबकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1999 से ही ताज ट्रिपेजियम जोन में बी.एस.3 वाहन पाबंद हैं।
चैथा काम- शहरी आवाम के घरों को सीवेज से जोड़ने के लिए चैंबर निर्माण और साथ में सीवेज निर्माण मगर मई 2017 यानी दस साल बाद जांच टीम को मिला कि सिर्फ सीवेज खोदा गया, चैंबर काम नहीं खोदा लिहाजा सारा बजट पानी हुआ, शहर व आवाम को क्या मिला सिर्फ उदासी, यमुना को क्या मिला सिर्फ गंदगी।
पांचवा काम- 448 लाख रूपए खर्च करके शहरी आवाम के लिए पेयजल सप्लाई टैंक शास्त्रीपुरम (निगम सीमा) में बनना था ताकि यमुना जल की उपलब्धता रहे, 2017 में जांच टीम को क्या मिला सिर्फ पुतला, शहरी आवाम को क्या मिला सिर्फ घर, घर में बोरिंग करने की मजबूरी क्योंकि फिजूलखर्ची के आदी अफसरों ने शहर (निगम सीमा) के बजाय ग्रामीण क्षेत्र (बृजवासन) में टैंक का बूत बनाकर इसलिए छोड़ दिया ताकि धन भी खर्च, जनता को लाभ भी न मिले। यमुना जल तो टैंक तक सदियों तक न पहुंचे, अब आप समझ गए होंगे कि 2007-08 में 74071 लाख की रकम सिर्फ निगम आगरा ने किस तरह बर्बाद की, शायद आप जरूर समझे होंगे मगर जांच टीम कौन थी, किस विभाग की जांच अंतिम है, कौन है भारत सरकार का वह अहम विभाग, यह जानने के लिए कल आने वाले संस्करण की प्रतीक्षा करें।