मित्रो! ब्रेस्ट मिल्क में यूरेनियम मिला, वैज्ञानिकों ने इसकी पुष्टि कर दी है। दर्जनों माताओं के दूध में जहर ने एक तरफ वैज्ञानिकों की चिंताएं बढ़ा दी, वहीं दूसरी तरफ एनजीटी-सुप्रीम कोर्ट, दोनों के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर दी।
बहरहाल मां के चुनौती कहा जाये, या मुसीबत खड़ी हो गई, कि जहां एक तरफ तय करना मुश्किल हो गया कि मां-बहने अब अपने बच्चों को जन्म देंगी या एटम बम को, वहीं दूसरी तरफ जो उपलब्धियां पाकिस्तान-आतंकिस्तान जैसे तबाह मुल्क में होनी चाहिए, वह हमारे देश में पैदा हो गईं, ऋषिमुनियों की धरती उगलने लगी, जो हमारे बिहार से पुष्टि की शुरुआत भी हो गई।
बहरहाल ब्रेस्ट मिल्क में यूरेनियम के गुनहगार दंडित करना एनजीटी सुप्रीम कोर्ट दोनों के लिए गंभीर चुनौती खड़ी हो गयी। ऐसा अपराध जिसने बच्चों की जिंदगी ही 10 साल की रखी, भला बताओ ऐसा विकास नाश की निशानी नहीं तो क्या है?
ऐसा अपराध, जिसका कारण असंवैधानिक संस्थाएं, या अपने नवजात शिशु को दूध पिलाने वाली माताएं..? ऐसा अपराध जिसकी सजा प्रदूषण बोर्ड को मिले, या मां-बहनों को, तय करना जरूरी भी, और गंभीर चुनौती भी हो गया सुप्रीम कोर्ट के लिए।
खैर मां के दूध में ऐसा जहर निकला है, जिसे पीते ही जन्म लेने वाला बच्चा या तो खत्म, या उसकी जिंदगी ही 10 साल की रह गई। मगर उससे भी ज्यादा चिंता बढ़ाने वाली विडंम्बनायें ये कि जहां एक तरफ वैज्ञानिक इसे गम्भीर चुनौती मान रहे, वहीं दूसरी तरफ कुछ वैज्ञानिक इसे खतरा नहीं मान रहे। खैर
बिहार में कई दर्जन महिलाओं के दूध में यूरेनियम पाया गया, कई जिलों की मां-बहनों के दूध में पुष्टि हुई, जिससे वैज्ञानिकों की चिंताएं बढ़ी हैं। मगर वैज्ञानिकों ने कहा कि यूरेनियम का स्तर बहुत कम है और इससे बच्चों के स्वास्थ्य पर कोई खतरा नहीं है। विशेषज्ञों ने माताओं को बिना चिंता के स्तनपान कराने की सलाह दी है, क्योंकि स्तनपान बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित और सर्वोत्तम पोषण है।
बिहार के कुछ जिलों में स्टडी के दौरान स्तनपान कराने वाली महिलाओं के दूध में यूरेनियम (यू-238) पाया गया है। इस रिपोर्ट ने चिंता जरूर बढ़ाई, लेकिन देश के शीर्ष वैज्ञानिकों ने साफ कहा है कि मिले हुए स्तर बेहद कम हैं और इससे बच्चों के स्वास्थ्य पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा।
40 माताओं के दूध के सैंपल लिए गए और सभी में थोड़ी मात्रा में यूरेनियम मिला है। एक स्टडी में ये खुलासा हुआ जो कुछ जिलों में ही नहीं, बल्कि बिहार और पूरे देश के लिए चिंता का विषय है। खैर स्टडी में सबसे ज्यादा औसत स्तर जिला खगड़िया और सबसे ज्यादा व्यक्तिगत स्तर कटिहार में मिला। एम्स दिल्ली के डॉ. अशोक शर्मा के अनुसार कुछ बच्चों में संभावित ‘नॉन-कार्सिनोजेनिक रिस्क’ दिखा, लेकिन वास्तविक नुकसान की संभावना बहुत कम है। वजह यह कि ज्यादातर यूरेनियम शरीर से मूत्र के जरिए निकल जाता है और दूध में बहुत कम मात्रा पहुंचती है।
स्टडी के अनुसार, दूध में पाए गए स्तर (0 से 5.25 माइक्रोग्राम/लीटर) डब्ल्यूएचओ के मानकों से काफी नीचे हैं। डब्ल्यूएचओ की सीमा 30 माइक्रोग्राम/लीटर है, यानि छह गुना ज्यादा। जिसके कारण एनडीएमए के न्यूक्लियर वैज्ञानिक डॉ. दिनेश के असवाल ने कहा कि यह स्तर पूरी तरह सुरक्षित सीमा में है किसी तरह की घबराहट की जरूरत नहीं है। माताएं बिना चिंता के स्तनपान जारी रखें। उनका कहना है कि मिट्टी और चट्टानों में स्वाभाविक तौर पर थोड़ा-बहुत यूरेनियम पाया जाता है और विश्वभर में ऐसे अति-क्षुद्र स्तर सामान्य माने जाते हैं।
परन्तु ऐसा माना जाता है कि लंबे समय तक उच्च स्तर का यूरेनियम बच्चों में किडनी और न्यूरोलॉजिकल विकास पर असर डाल सकता है। लेकिन मौजूदा रिपोर्ट में मिला स्तर इतना कम है कि विशेषज्ञ इसे ‘कमखतरा’ मानते हैं। इसीलिए डॉक्टरों का स्पष्ट सुझाव है कि बच्चों के लिए स्तनपान ही सबसे सुरक्षित और सर्वोत्तम पोषण है। डब्ल्यूएचओ और यूएनआईसीईएफ भी यही सलाह देते हैं।
शोधकर्ताओं ने बताया कि भविष्य में अन्य राज्यों में भी ऐसे अध्ययन किए जाएंगे ताकि भारी धातुओं और पर्यावरणीय प्रदूषकों जैसे कीटनाशक आदिकी स्थिति का पता चल सके। शोधकर्ता पहले ही आर्सेनिक, लेड और मरकरी जैसे धातुओं पर भी काम कर चुके हैं।
