National Girl Child Day – Rashtriya Samasya https://rashtriyasamasya.com Rashtriya Samasya Thu, 23 Jan 2025 10:13:16 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.4 https://rashtriyasamasya.com/wp-content/uploads/2024/08/cropped-rastriya-32x32.png National Girl Child Day – Rashtriya Samasya https://rashtriyasamasya.com 32 32 बच्चियों को उड़ने की आजादी दें, पंख खुद लगा लेंगी https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%89%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a6/ https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%89%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a6/#respond Thu, 23 Jan 2025 10:13:15 +0000 https://rashtriyasamasya.com/?p=8003 राष्ट्रीय बालिका दिवस (24 जनवरी) पर विशेष

देश में ‘राष्ट्रीय बालिका दिवस’ का आज 17 संस्करण मनाया जा रहा है। इस महत्वपूर्ण दिवस की शुरुआत केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा सन-2008 से हुई। इसी दिन यानी 24 जनवरी 1966 को इंदिरा गांधी ने पहली बार बतौर प्रधानमंत्री कार्यभार संभाला था। राष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर पूरे भारत में विभिन्न स्तरीय कार्यक्रम आयोजित होते हैं, जिनमें ‘सेव द गर्ल चाइल्ड’, ‘चाइल्ड सेक्स रेशियो’ व ‘चाइल्ड क्राइम प्रोटेक्शन’ अभियानों के अलावा बालिकाओं के स्वास्थ्य और उन्हें सुरक्षित वातावरण देने सहित तमाम तरह की जागरूकता मुहिम चलाई जाती है। इसमें सामाजिक और सरकारी संस्थानों की भागीदारी होती है।अफसोस, ऐसी तमाम कोशिशों के बावजूद बालिकाओं के विरुद्ध होने वाले जुल्म और अपराध कम नहीं हो रहे।

किशोरियों की तस्करी सबसे बड़ा चिंता का विषय है। कई राज्यों में बच्चियां अपने घरों में बंदिशों की बेड़ियों में जकड़ी हुई हैं। केंद्र सरकार ने हाल ही में संपन्न हुए संसद के शीतकालीन सत्र में आंकड़ा पेश कर बताया कि पूरे देश में अभी लाखों की संख्या में बच्चियों को उनके अभिभावक स्कूलों में नहीं भेजते। ये हाल तब है जब बच्चियों की शिक्षा पर केंद्र व राज्य सरकारें सजगता से लगी हुई हैं। यहां सरकारों को दोष नहीं दे सकते। बच्चियों से जुड़ी मौजूदा समय की सबसे विकराल समस्या ‘बाल तस्करी’ ही है। इस विकट समस्या का कैसे समाधान हो, इसे लेकर जनमानस कैसे जागरूक हों आदि विषय को ध्यान में रखकर ही सालाना 24 जनवरी को पूरे भारत में ‘राष्ट्रीय बालिका दिवस’ मनाया जाता है।

बेटियों के सम्मान में केंद्र सरकार का ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा जबरदस्त सफल रहा है। इससे बालिका लिंगानुपात में भी इजाफा हुआ है। 2014 में बेटियों के जन्मानुपात का आंकड़ा 918 था, तो वहीं 2022-23 में 15 अंकों की छलांग लगाकर ये आंकड़ा 933 तक जा पहुंचा। इस आंकड़े में हरियाणा अभी भी पिछड़ा हुआ है। देश की तरक्की में बेटियों को उड़ने की आजादी मिलनी चाहिए। उनकी शिक्षा-दीक्षा में कोई कोर-कसर नहीं छोड़नी चाहिए। हालांकि किशोरियों के लिए जबसे माहौल बदला है, उन्होंने अपनी काबीलियत साबित कर दी है। रक्षा से लेकर खेल तक कोई ऐसा क्षेत्र नहीं हैं जहां बेटियां परचम न फहरा रही हों। लड़कियों के प्रति रुढ़िवादी सोच से लोग अब किनारा करने लगे हैं। कुछ लोग जो इस सोच से बाहर नहीं निकल रहे, वे अपनी लड़की को उनके अधिकारों से वंचित रखते हैं, इससे उनका करियर बन ही नहीं पाता। बच्चियों के भविष्य को अंधकार में धकेलने में परिवारों की भी बड़ी भूमिका होती हैं। परिवार ऐसा न करें, उनको समझाने के लिए ही आज का ये खास दिवस मनाया जाता है।

बच्चियों पर जुल्म समाज का सबसे बड़ा कलंक माना जाता है। इस कलंक को मिलकर मिटाना होगा। एनसीआरबी की मानें तो भारत में सालाना हजारों की संख्या में बच्चियां लापता होती हैं, जिनमें से अधिकांश बच्चियों उम्र महज 8-10 वर्ष होती हैं। गृह मंत्रालय के मुताबिक, साल 2019 से 2021 में 13.13 लाख गायब महिलाओं में ज़्यादातर लड़कियां की संख्या रही। वहीं, केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार बीते 5 सालों में 2.75 लाख बच्चे गुम हुए जिनमें से 2.12 लाख सिर्फ लड़कियां थीं। लापता बच्चों के मामले में पश्चिम बंगाल अव्वल है जहां साल-2022 में 12,546 लड़कियां गुम हुईं। मध्य प्रदेश दूसरे नंबर पर है जहां 11,161 किशोरियां गायब हुईं। बाकी प्रदेशों के हाल भी अच्छे नहीं हैं। इसके अलावा बाल तस्करी, बाल विवाह और नाबालिगों के साथ यौन शोषण की घटनाएं भी कम होने के जगह बढ़ी हैं। इन्हें सामूहिक प्रयासों से रोकना होगा।

निश्चित रूप से ‘राष्ट्रीय बालिका दिवस’ समूचे भारत में बच्चियों के समक्ष आने वाली चुनौतियों की शिनाख्त कर उन चुनौतियों से जूझने की तरफ ध्यान आकर्षित करता है। हमारी सामाजिक जिम्मेदारी ये बनती है कि बच्चियों के विरुद्ध घटित अपराधों और संभावित खतरों से मुंह नहीं फेरना चाहिए। सबसे पहले बालिकाओं की तस्करी पर अंकुश लगना चाहिए क्योंकि यह किसी भी देश के लिए घोर कलंक जैसा है।

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राष्ट्रीय बालिका दिवस पर विशेष : बालिकाओं को बनाना होगा आत्मनिर्भर https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%b8-%e0%a4%aa%e0%a4%b0/ https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%b8-%e0%a4%aa%e0%a4%b0/#respond Wed, 22 Jan 2025 08:34:07 +0000 https://rashtriyasamasya.com/?p=7885 भारत में हर साल 24 जनवरी को लड़कियों को सशक्त बनाने और उनके सामने आने वाली चुनौतियों के समाधान के महत्व को उजागर करने के लिए राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है। यह लड़कियों के अधिकारों और अवसरों को बढ़ावा देते हुए उनकी ताकत और क्षमता का जश्न मनाने का दिन है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा 2008 में पहली बार राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाना शुरू किया गया था। देश में लड़कियों द्वारा सामना की जाने वाली सभी असमानताओं के बारे में लोगों के बीच जागरूकता फैलाना व बालिकाओं के अधिकारों के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देना, इसे मनाने का मुख्य उदेश्य है।

हमारे देश में बड़ी विडंबना है कि हम बालिका का पूजन तो करते हैं लेकिन जब हमारे खुद के घर बालिका जन्म लेती है तो हम दुखी हो जाते हैं। देश में सभी जगह ऐसा देखा जा सकता है। देश के कई प्रदेशों में तो बालिकाओं के जन्म को अभिशाप तक माना जाता है। लेकिन बालिकाओं को अभिशाप मानने वाले लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि वह उस देश के नागरिक हैं, जहां रानी लक्ष्मीबाई जैसी विरांगनाओं ने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। 24 जनवरी 1966 को पहली बार बतौर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपना कार्यभार संभाला था। उस दिन की याद में राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाने लगा। राष्ट्रीय बालिका दिवस 2024 का विषय है- आइए हम अपनी लड़कियों को मजबूत, स्वतंत्र और निडर बनाएं।

भारत में आज हर क्षेत्र में बालिकाओं के आगे बढ़ने के बावजूद वह अनेकों कुरीतियों की शिकार हैं। ये कुरीतियों उसके आगे बढ़ने में बाधाएं उत्पन्न करती है। पढ़े-लिखे लोग और जागरूक समाज भी इस समस्या से अछूता नहीं है। आज हजारों लड़कियों को जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है। आज भी समाज के अनेक घरों में बेटा, बेटी में भेद किया जाता है। बेटियों को बेटों की तरह अच्छा खाना और अच्छी शिक्षा नहीं दी जाती है।

समाज में आज भी बेटियों को बोझ समझा जाता है। हमारे यहां आज भी बेटी पैदा होते ही उसकी परवरिश से ज्यादा उसकी शादी की चिन्ता होने लगती है। आज महंगी होती शादियों के कारण बेटी का बाप हर समय इस बात को लेकर चिंतित नजर आता है कि उसकी बेटी की शादी की व्यवस्था कैसे होगी। समाज में व्याप्त इसी सोच के चलते कन्या भ्रूण हत्या पर रोक नहीं लग पायी है। कोख में कन्याओं को मार देने के कारण समाज में आज लड़कियों की काफी कमी हो गयी है।

देखा जाय तो अगर समाज में बेटियों को भी उचित शिक्षा और सम्मान मिले तो कभी भी बेटिया किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं रहेंगी। इसलिए यदि यह कहा जाय की बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना नहीं, हम सबकी एक जिम्मेदारी है। तो इसमें कोई गलत नहीं है। यदि हम सभी एक अच्छे समाज का निर्माण करना चाहते हैं तो हम सबका यही फर्ज बनता है कि हम इन बेटियों को भी भयमुक्त वातावरण में पढ़ायें। उन्हें इतना सशक्त बनायें कि खुद गर्व से कह सकें कि देखो वह हमारी बेटी है जो इतना बड़ा काम कर रही है।

आज लड़कियां लड़कों से किसी भी क्षेत्र में कमतर नहीं हैं। दुश्कर से दुश्कर कार्य लड़कियां सफलतापूर्वक कर रही हैं। देश में हर क्षेत्र में महिला शक्ति को पूरी हिम्मत से काम करते देखा जा सकता है। समाज के पढ़े-लिखे लोगों को आगे आकर कन्या भ्रूण हत्या जैसे घिनौने कार्य को रोकने का माहौल बनाना होगा। ऐसा करने वाले लोगों को समझा कर उनकी सोच में बदलाव लाना होगा। लोगों को इस बात का संकल्प लेना होगा कि ना तो गर्भ में कन्या की हत्या करेगें ना ही किसी को करने देगें तभी देश में कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लग पाना संभव हो पायेगा।

एक तरफ जहां बेटी को जन्मते ही मरने के लिये लावारिश छोड़ दिया जाता है। वहीं झुंझुनू जिले की मोहना सिंह जैसी बालिकायें भी है जो आज देश में फाईटर प्लेन उड़ा कर जिले का पूरे देश में मान बढ़ा रही हैं। समाज में सभी को मिलकर राष्ट्रीय बालिका दिवस के दिन हमें लड़का-लड़की में भेद नहीं करने व समाज के लोगों को लिंग समानता के बारे में जागरूक करने की प्रतिज्ञा लेनी चाहिए।

पिछले कुछ वर्षों में देश में जन्म के समय लिंगानुपात में बढ़ोतरी शुभ संकेत हैं। संसद में एक सवाल का जवाब में महिला एवं बाल विकास मंत्री ने कहा था कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना ने बालिकाओं के अधिकारों को स्वीकार करने के लिए जनता की मानसिकता को बदलने की दिशा में सामूहिक चेतना जगाई है। इस योजना ने भारत में सीएसआर (बाल लिंग अनुपात) में गिरावट के मुद्दे पर चिंता जताई है। यह राष्ट्रीय स्तर पर जन्म के समय लिंग अनुपात (एसआरबी) में 15 अंकों के सुधार के रूप में परिलक्षित होता है। जो कि 2014 में 918 था। जबकि 2022-23 में 15 अंक बढ़कर 933 हो गया।

हमारे समाज का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि हम आज अपनी बच्चियों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं और उन्हें कितना महत्व देते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, कानूनी सुरक्षा और सामाजिक सशक्तिकरण के माध्यम से बालिकाओं को सशक्त बनाना न केवल नैतिक दायित्व है बल्कि सामाजिक विकास के लिए जरूरी भी है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि लड़कियों को आगे बढ़ने, सीखने के समान अवसर मिले। तभी हम एक संतुलित, न्यायसंगत और समृद्ध समाज बना सकेंगे।

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