Delhi Vidhansabha Chunav – Rashtriya Samasya https://rashtriyasamasya.com Rashtriya Samasya Mon, 27 Jan 2025 09:17:28 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.4 https://rashtriyasamasya.com/wp-content/uploads/2024/08/cropped-rastriya-32x32.png Delhi Vidhansabha Chunav – Rashtriya Samasya https://rashtriyasamasya.com 32 32 दिल्ली के हर मतदाता के हाथ में लड्डू! https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a4%a4%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a5/ https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a4%a4%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a5/#respond Mon, 27 Jan 2025 09:17:27 +0000 https://rashtriyasamasya.com/?p=8312 दिल्ली में विधानसभा चुनाव बेहद अलग और दिलचस्प है। मौजूदा सरकार के सुप्रीमो केजरीवाल जैसी मुफ्त की रेवड़ियों का वादा अब तो सभी पार्टियां और राज्य न केवल करने लगे हैं बल्कि पूरा भी कर रहे हैं। ऐसे में यह चुनाव वाकई दिल्ली वालों के लिए हर हाथ में लड्डू जैसे होंगे। इतना है कि इस बार मुकाबला न केवल कांटे का बल्कि त्रिकोणीय सा बनता जा रहा है। लेकिन यह भी सच है कि सरकार किसी की बने लुभावनी योजनाओं का अंबार होगा। इससे दिल्ली की कितनी तकदीर बदलेगी यही देखने लायक होगा।

दिल्ली का चुनावी सफर भी दिलचस्प है। 1952 में पहली बार राज्य विधानसभा का गठन हुआ तब 48 सीटें थीं। कांग्रेस ने 36 सीटों पर जबरदस्त जीत दर्ज की। 34 वर्ष के चौधरी ब्रह्म प्रकाश मुख्यमंत्री बने जो नेहरू जी की पसंद थे। दरअसल कांग्रेस देशबंधु गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाना चाह रही थी लेकिन एक हादसे में उनकी मृत्यु के चलते ब्रह्म प्रकाश एक्सीडेंटल मुख्यमंत्री बने। बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले रेवाड़ी के निवासी ब्रह्म प्रकाश कभी भी मुख्यमंत्री आवास में नहीं रहे। बिना तामझाम काम करते और जनसाधारण के बीच रहते। 1955 में कांग्रेस ने गुरमुख निहाल सिंह को मुख्यमंत्री बनाया जो 1956 तक रहे। राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के चलते साल भर बाद दिल्ली विधानसभा भंग हुई। 1966 में इसकी जगह मेट्रोपोलिटन काउंसिल बनी। इसमें 56 निर्वाचित और पांच मनोनीत सदस्यों का प्रावधान था। लेकिन 1991 में 69वें संविधान संशोधन के जरिए दिल्ली विधानसभा की व्यवस्था हुई और 1992 में परिसीमन और 1993 में चुनाव हुए।

1993 में भाजपा बहुमत में आई। मदन लाल खुराना मुख्यमंत्री बने और 1956 के बाद दिल्ली को कोई मुख्यमंत्री मिला। लेकिन पांच साल में तीन मुख्यमंत्री बदले गए। खुराना को घोटाले के आरोपों के चलते कुर्सी छोड़नी पड़ी। फिर साहिब सिंह वर्मा आए और महंगाई के मुद्दे पर ऐसे घिरे कि उन्हें भी इस्तीफा देना पड़ा। इनके बाद सुषमा स्वराज को कमान मिली जो महज 52 दिन मुख्यमंत्री रहीं।

1998 के चुनाव में भाजपा ने सुषमा स्वराज को तो कांग्रेस ने शीला दीक्षित को आगे किया। कांग्रेस की जीत हुई और शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनीं। दिल्ली में फ्लाई ओवरों का जाल, मेट्रो रेल का विस्तार, डीजल की जगह सीएनजी के उपयोग को बढ़ावा और हरियाली पर खास ध्यान सहित दूसरे काम उनकी पहचान बने। 1998 से 2013 तक तीन बार लगातार दिल्ली की सत्ता पर कांग्रेस और शीला दीक्षित काबिज रहीं। इस बीच 2011 में जन लोकपाल विधेयक की मांग पर दिल्ली में अन्ना आंदोलन हुआ। अप्रैल में पांच दिन का आमरण अनशन और दोबारा 16 अगस्त से फिर अनशन बैठते ही देश भर में आन्दोलनों की दस्तक हुई। आखिर संसद में बिल पास हुआ और देखते-देखते अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, आतिशी और कई चेहरे भारतीय राजनीति के नए हीरो बन गए। आम आदमी पार्टी ने 2013 का दिल्ली चुनाव लड़ा और 15 वर्षों से काबिज कांग्रेस सरकार गिरा दी। 70 सीटों में भाजपा ने 32 जीती फिर भी बहुमत से दूर रही। आम आदमी पार्टी 28 सीटें जीतने के बाद कांग्रेस की 7 सीटों के समर्थन से सरकार बनाने में कामयाब रही और अन्ना आन्दोलन से उपजे केजरीवाल पहली बार मुख्यमंत्री बने।

कहते हैं राजनीति शह-मात का खेल है। आआपा और कांग्रेस की नहीं निभी। आखिर 49 दिन में सरकार गिर गई और राष्ट्रपति शासन लग गया। 2015 में फिर चुनाव हुए। इसमें दिल वालों की दिल्ली ने केजरीवाल पर अपनी उम्मीदों की बख्शीश खूब लुटाई। 70 में से 67 रिकॉर्ड सीटें जीतकर केजरीवाल भारतीय राजनीति के नए सितारे बन गए। भाजपा केवल तीन सीटें तो कांग्रेस खाता भी नहीं खोल पाई। केजरीवाल भी अपनी तमाम घोषणाओं पर अमल करते रहे। नतीजन 2020 में एक बार आम फिर आदमी पार्टी ने 62 सीटें तो भाजपा 8 से आगे नहीं बढ़ पाई। कांग्रेस शून्य पर ही रही। लुभावनी योजनाओं का असर दिखा। आआपा को फिर बहुमत मिला और केजरीवाल मुख्यमंत्री बने। इसके बाद विवादों में घिरे, जेल गए और मुख्यमंत्री पद छोड़ा। अब दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी भले हैं लेकिन पार्टी सुप्रीमो केजरीवाल ही हैं।

बेहतरीन सरकारी स्कूल, मोहल्ला क्लीनिक, महिलाओं को मुफ्त बस सुविधा, 200 यूनिट बिजली फ्री, 20 हजार लीटर मुफ्त पानी, बुजुर्गों का मुफ्त तीर्थ दर्शन जैसी अन्य योजनाओं के साथ नई-नई घोषणाएं करते केजरीवाल तो 1998 से 2013 तक के कार्यकाल को दिल्ली का स्वर्णिम काल बता कांग्रेस असली विकास और उपलब्धियां गिनाते नहीं थकती। भाजपा मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की तर्ज पर महिलाओं को हर महीने धनराशि देने, मौजूदा योजनाओं को न केवल जारी रखने बल्कि उसमें बढ़ोतरी करने जैसा संकल्प यानी एक से एक लुभावनी घोषणाओं का पिटारा खोल आम आदमी पार्टी को चुनौती देने में कोई कसर छोड़ते नहीं दिखती।

मुफ्त की रेवड़ियों, लोक-लुभावन घोषणाओं के बीच दिल्ली का प्रदूषण, यमुना की गंदगी, बदहाल सड़कें, बरसात में डूबते पुल-पुलिया, पीने के पानी की किल्लत, बढ़ते अपराध और इन सबसे ऊपर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा जैसे अहम मुद्दे काफी पीछे छूट गए हैं। काश! एक करोड़ की आबादी खातिर मौजूदा संसाधनों वाली दिल्ली में तीन करोड़ लोग कैसे रहते हैं को देखने, सुनने वाले जैसे आम आदमी के मुद्दों की भी बात होती। लेकिन फिलहाल माल-ए-मुफ्त, दिल-ए-बेरहम की तर्ज पर मतदाताओं को लुभाने में कोई पीछे नहीं दिखता। अब दिल्ली की बात कौन करे? देखने लायक होगा कि त्रिकोणीय मुकाबले में कौन किसको कितना नुकसान पहुंचाता है और बाजी जीतता है।

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दिल्ली विधानसभा चुनाव नतीजे तय करेंगे आआपा का भविष्य https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b8%e0%a4%ad%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%a8%e0%a4%a4/ https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b8%e0%a4%ad%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%a8%e0%a4%a4/#respond Sat, 25 Jan 2025 09:00:30 +0000 https://rashtriyasamasya.com/?p=8241 05 फरवरी, 2025 को होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे 08 फरवरी, 2025 को घोषित होंगे। केवल इस विधानसभा चुनाव में अगर जीत न मिल पाई तो आम आदमी पार्टी (आआपा) का बिखरना तय माना जा रहा है। चुनाव में तो वैसे अनेक दल अपने उम्मीदवार खड़े किए हुए हैं लेकिन चुनाव आआपा, भाजपा और कांग्रेस के बीच माना जा रहा है। अपने 13 साल के राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहे आआपा के सर्वेसर्वा और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की साख दांव पर है। शराब घोटाले में छह महीने जेल में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट से सशर्त जमानत पर बाहर आते ही उन्होंने विधानसभा चुनाव प्रचार शुरू कर दिया। संभावित हार से आशंकित केजरीवाल हर रोज कोई न कोई घोषणा करके चुनावी बाजी पलटने में लगे हुए हैं। उनके कट्टर ईमानदार की छवि को शराब घोटाले से अधिक शीशमहल (मुख्यमंत्री की सरकारी कोठी पर करोड़ों खर्च करके महल बनाने का मामला) कांड ने खराब कर दिया है। कैग (सीएजी) रिपोर्ट ने उनके और उनकी सरकार के भ्रष्टाचार के मामले उजागर करके उनको महाभ्रष्ट साबित कर दिया। उस रिपोर्ट को विधानसभा में न पेश करके उन्होंने अपनी खूब बेइज्जती करवाई। जिसे आम लोग कहते थे वही देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कह दिया। वे आआपा को आप-दा कहने लगे हैं और उनका कहना है कि हार को टालने के लिए केजरीवाल रोज कोई न कोई घोषणा कर रहे हैं।

1998 से दिल्ली की सत्ता से बाहर रही भाजपा इस बार पूरे दमखम से सत्ता पाने के लिए लगी हुई है। चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा से लेकर देशभर के बड़े भाजपा नेता, अनेक राज्यों के मुख्यमंत्री व नेता दिल्ली में सभा कर रहे हैं। दिल्ली में विधानसभा की 70 सीटें हैं। हर सीट पर भाजपा ने कई स्तर के नेताओं को जिम्मेदारी दी है। गुटबाजी टालने के लिए भाजपा ने बिना मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किए चुनाव लड़ना तय किया है। चुनाव की घोषणा थोड़े ही दिन पहले हुई लेकिन भाजपा तो काफी समय से केजरीवाल और उनकी टीम का पर्दाफाश करने में लगी हुई है। इस बार सोशल मीडिया पर भी भाजपा आआपा से काफी आगे है। आआपा के सर्वेसर्वा केजरीवाल ने खुद पार्टी में शुरू से जुड़े अनेक बुद्धिजीवियों को पार्टी से अलग करके अपने हाथ काट लिए। अब उनका बचाव करने वाले बेहद नौसीखिए हैं जो रटा रटाया बयान दोहराकर अपनी और अपनी पार्टी की जगहंसाई करवा रहे हैं।

सालों दिल्ली पर राज करने वाली कांग्रेस साल 2013 यानी आआपा के वजूद में आने के बाद से लगातार हाशिए पर पहुंचती जा रही है। लगातार 15 साल दिल्ली की मुख्यमंत्री रही शीला दीक्षित 2013 का विधानसभा चुनाव न केवल खुद हारी बल्कि कांग्रेस को 24.50 फीसद वोट और केवल आठ सीटें मिली। 2015 के विधानसभा चुनाव में उसे कोई सीट नहीं मिली और उसका वोट औसत घटकर 9.71 फीसद रह गया। इतना ही नहीं 2020 के विधानसभा चुनाव में उसे केवल 4.26 फीसद वोट मिले। अभी 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का आआपा से सीटों का तालमेल था। सात में से तीन सीटों पर कांग्रेस और चार पर आआपा लड़ी। चुनाव में सभी सातों सीटें भाजपा लगातार तीसरी बार जीती। कांग्रेस को 18.50 फीसद वोट मिले। कांग्रेस के ताकतवर हो जाने के डर से इस चुनाव में आआपा ने कांग्रेस से समझौता नहीं किया लेकिन कांग्रेस ने मजबूती से चुनाव लड़ना तय किया।

कांग्रेस ने अपने मूल वोटर-अल्पसंख्यक, दलित और पूर्वांचल (पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के मूल निवासी) के लोगों का समर्थन पाने के लिए चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी है। दिल्ली में मुस्लिम आबादी अब 12 से बढ़ कर 15 फीसद से ज्यादा हो गई है। 70 में से 17 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम मतदाता 20 फीसद से ज्यादा हैं। इनमें सीलमपुर, मटिया महल, बल्लीमरान, ओखला, मुस्तफाबाद, किराड़ी, चांदनी चौक, गांधीनगर, करावल नगर, विकास पुरी, ग्रेटर कैलाश, कस्तूरबा नगर, बाबरपुर, मोतीनगर, मालवीय नगर, सीमापुरी और छत्तरपुर शामिल हैं। उनपर कांग्रेस के न केवल उम्मीदवार मजबूत हैं बल्कि कांग्रेस पूरी ताकत से लगी है। इसी तरह 12 अनूसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर भी कांग्रेस ने पूरी तैयारी की है। दलितों में कांग्रेस का कुछ असर अब भी बचा है। उन इलाकों में कांग्रेस की सभा में भीड़ जुट रही है। पूर्वांचल के प्रवासी दिल्ली में सालों कांग्रेस का साथ देकर उसे सत्ता दिलाते रहे। दिल्ली के 70 में से 42 सीटों पर पूरबियों (पूर्वांचल के प्रवासी) का वोट 20 फीसद से ज्यादा है।

यह तीनों और दिल्ली के गांव का एक वर्ग अगर कांग्रेस से जुड़ जाए तो उसके पुराने दिन लौट आ जाएंगे। कांग्रेस इस चुनाव में धन-बल से इस प्रयास में लगी है। कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय नेता राहुल गांधी दिल्ली के अल्पसंख्यक इलाकों से जनसभा की शुरुआत कर चुके हैं।

कांग्रेस यह संदेश देने में लगी है कि वही देशभर में भाजपा से लड़ रही है। 2022 के नगर निगम चुनाव में कांग्रेस को सात अल्पसंख्यक सीटों पर जीत दिला कर यह संदेश पहले ही दे दिया था। इसी भरोसे 2013 के चुनाव में कांग्रेस को अल्पसंख्यकों का साथ मिला तो उसके वोट औसत बढ़ गए और साथ छोड़ा तो कांग्रेस हाशिए पर पहुंच गई। दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ समाजसेवी अण्णा हजारे के आंदोलन में शामिल अनेक लोगों ने 26 अक्तूबर, 2012 को आआपा के नाम से राजनीतिक दल बनाकर 2013 में होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ना तय किया। वैसे अण्णा हजारे ने राजनीतिक पार्टी बनाने का विरोध किया था। पहले ही चुनाव में ही बिजली-पानी फ्री का मुद्दा कारगर हुआ। आआपा को 70 सदस्यों वाले विधानसभा में करीब 30 फीसद वोट और 28 सीटें मिली। भाजपा करीब 34 फीसद वोट के साथ 32 सीटें जीती। दिल्ली में 15 साल तक शासन करने वाली कांग्रेस को 24.50 फीसद वोट के साथ केवल आठ सीटें मिली। माना गया कि दिल्ली का अल्पसंख्यक भाजपा को हराने वाले दल का सही अनुमान लगाए बिना कांग्रेस को वोट दिया था। अगले चुनाव में अल्पसंख्यक आआपा से जुड़ गए तो कांग्रेस हाशिए पर पहुंच गई।

कांग्रेस की कमजोरी और भाजपा की अधूरी तैयारी के चलते और बिजली-पानी फ्री के वायदे ने आआपा को 2015 के चुनाव में दिल्ली विधानसभा में रिकार्ड 54 फीसदी वोट के साथ 67 सीटों पर जीत दिलवा दी। उस चुनाव ने कांग्रेस को भारी नुकसान पहुंचाया। कांग्रेस कोई सीट नहीं मिली और उसका वोट औसत घट कर 9.7 पर आ गया। 2020 के विधानसभा चुनाव में आआपा को फिर से भारी जीत मिली। उसे 70 में से 62 सीटें मिली। फिर तो आआपा पंजाब में भी विधानसभा चुनाव जीत कर सरकार बना ली और अखिल भारतीय पार्टी का दर्जा हासिल कर लिया। इतना ही नहीं वह जगह-जगह कांग्रेस का विकल्प बनने की कोशिश करने लगी। इस दौरान विभिन्न आरोपों में एक-एक करके आआपा नेताओं की गिरफ्तारी और शराब घोटाले की आंच पार्टी के प्रमुख केजरीवाल तक पहुंचने, उनकी गिरफ्तारी आदि ने आआपा की साख को बट्टा लगा दिया। इस चुनाव में तो आआपा को हराने के लिए मुफ्त की रेवड़ियां घोषित करने में आआपा से आगे कांग्रेस और भाजपा निकल गई। भाजपा ने तो किश्तों में घोषणा (संकल्प) पत्र जारी किया और यह अभी जारी है। कांग्रेस भी आआपा से एक कदम आगे बढ़ कर घोषणाएं करनी शुरू कर दी है। आआपा को उसी के मुद्दे पर विरोधी दलों ने बुरी तरह से घेर दिया है। आआपा के लिए बचाव का रास्ता कम बचा है। आआपा के पक्ष में बोलने वाले बड़े नेताओं की तादाद लगातार घट रही है। कुछ को केजरीवाल ने पार्टी से अलग किया और कुछ खुद उनके व्यवहार से बाहर हो गए।

जेल जाने के बावजूद अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं छोड़ी और सुप्रीम कोर्ट ने जब जमानत देते हुए उन्हें दफ्तर न जाने, सरकारी फाइल न देखने आदि की हिदायत दी तब मुख्यमंत्री पद छोड़कर आतिशी को मुख्यमंत्री बना दिया। वह पहले दिन से अपने को केयरटेकर बताने में लगी हुई हैं। जिस भ्रष्टाचार को हथियार बनाकर राजनीति शुरू की, उसी भ्रष्टाचार में चारों तरफ से घिर गए। जो काम वे और उनकी पार्टी के लोग गिना रहे हैं, उस पर लोगों को यकीन नहीं हो रहा है। खुद केजरीवाल ने यमुना नदी की सफाई न कर पाने, हर घर को साफ पानी न दे पाने और दिल्ली की सड़कों को न ठीक करवाने के लिए माफी मांग ली। उनके काम के दावों पर लोगों को यकीन नहीं हो रहा है। कहने के लिए आआपा अब राष्ट्रीय पार्टी है। पंजाब में उसकी सरकार है लेकिन दिल्ली हारते ही केजरीवाल पस्त हो जाएंगे। यह पार्टी पूरी तरह से केजरीवाल की पार्टी है। उसके बाद पार्टी को बिखरते देर नहीं लगेगी।

चुनाव प्रचार के दौरान जो दिल्ली का माहौल लग रहा है, उससे यही लग रहा है कि भले कांग्रेस मुख्य मुकाबले में न आ पाए लेकिन इतने वोट पा जाएगी कि आआपा के वोट औसत में भारी गिरावट होगी। इसका लाभ सीधे भाजपा को मिलना तय है। अगर मतदान तक हालात नहीं बदले तो इस बार दिल्ली की सरकार से आआपा दूर हो सकती है। सभाओं के हिसाब से भी ज्यादा भीड़ भाजपा के नेता जुटा रहे हैं। हड़बड़ी में आआपा नेता अरविंद केजरीवाल गलतबयानी कर रहे हैं। रामायण प्रकरण पर उनकी टिप्पणी से उनकी खूब जगहंसाई हुई। हर रोज चुनाव प्रचार तीखा होता जा रहा है। चुनाव प्रचार में घटिया निजी आरोप लग रहे हैं। भाजपा लंबे इंतजार के बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव जीतने के लिए और आआपा हार से बचने के लिए कोई कोर-कसर छोड़ने को तैयार नहीं। वैसे तो हर चुनाव महत्वपूर्ण होता है लेकिन यह चुनाव आआपा नेता के राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन चुनाव बन गया है।

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रेवड़ियों पर केंद्रित होता दिल्ली विधानसभा चुनाव https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a5%8b/ https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a5%8b/#respond Thu, 23 Jan 2025 07:58:38 +0000 https://rashtriyasamasya.com/?p=7975 दिल्ली में चुनावी घमासान के बीच रेवड़ी बांटने की प्रतिस्पर्धा-सी दिख रही है। ऐसा लगता है कि अब दिल्ली की सत्ता तक पहुँचने का मार्ग केवल मुफ्त की रेवड़ी ही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक दल जनता के बीच अपने पिटारे से मुफ्त वाली विभिन्न योजनाएं गिना रहे हैं। इस होड़ में आम आदमी पार्टी पहले ही पिटारा खोल कर बैठी है। अब कांग्रेस और भाजपा भी उसी रास्ते की ओर प्रवृत्त है। एक तथ्य ध्यान देने योग्य है कि आम आदमी पार्टी के पास कुछ नया नहीं है क्योंकि वह पिछले चार विधानसभा चुनाव से इसी राह पर चल रही है। मुफ्त की योजनाओं के वादे करना आम आदमी पार्टी की फितरत बन गई है। इससे अलग अपेक्षा नहीं की जा सकती क्योंकि यह मार्ग उसके लिए लाभकारी साबित होता रहा है। इसलिए आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को इस बार भी उन्हीं के नाम बाजी होने का पूरा विश्वास है।

वर्तमान में दिल्ली विधानसभा चुनाव के प्रचार में राजनीतिक दलों के नेताओं की ओर रेवड़ियों की झड़ी लगाई जा रही है। ऐसा लगता है कि दिल्ली की जनता को रेवड़ी की आदी हो चुकी है। इसका राजनीतिक आशय यह भी निकाला जा सकता है कि अपना नायक चुनने के लिए किसकी रेवड़ी स्वार्थ पूर्ति करने वाली है, यह ही देखा जाएगा। इस कवायद को लालच देकर वोट प्राप्त करने का माध्यम भी माना जा सकता है क्योंकि मुफ्त में खजाना लुटाना किसी प्रकार से न्यायसंगत नहीं माना जा सकता क्योंकि इसका बोझ उस समाज पर आता है, जो योजना का लाभ लेने के पात्र नहीं होते। हालांकि सरकार की तरफ से आम जनता का ध्यान रखा ही जाना चाहिए लेकिन इसके लिए मुफ्त की योजना की जगह अन्य तरीके अपनाए जाएं तो बेहतर होगा। नहीं तो एक दिन यही योजनाएं विकास योजनाएं न होकर विनाशकारी मार्ग तैयार कर सकती हैं।

दिल्ली में एक दशक पहले भाजपा और कांग्रेस के बीच ही चुनावी लड़ाई होती रही थी, लेकिन कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार के विरोध में एक धूमकेतु की तरह अरविन्द केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी उभरी, जिसने लोक लुभावने वादे कर आम जनता का छप्पर फाड़ समर्थन प्राप्त करके दिल्ली के सिंहासन को कब्जे में ले लिया। मौजूदा चुनाव में एकबार फिर बहुकोणीय मुकाबला होने की तस्वीर बन रही है। आम आदमी पार्टी साथी दलों को हाथ छुड़ा कर अकेले ही चुनावी मैदान में उतरी है। लेकिन उसकी सबसे बड़ी परेशानी यह है कि उसके नेता अरविन्द केजरीवाल पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। ऐसा कहना भी समुचित होगा कि केजरीवाल की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर है। एक समय सुविधाओं को त्याग कर राजनीति करने की कसम खाने वाले केजरीवाल की जीवन शैली भौतिक सुख-सुविधाओं से भरी मालूम पड़ती है। शीशमहल के नाम से भाजपा द्वारा प्रचारित उनके आवास में लग्जरी सुविधाएं हैं। जो उनके कथन से कतई मेल नहीं रखती। ऐसे में यह कहना तर्कसंगत होगा कि इस बार केजरीवाल की राह उतनी आसान नहीं है, जो पहले थी। दूसरी बड़ी बात यह है कि इस बार के चुनाव में आम आदमी पार्टी के समक्ष गंभीर चुनौतियाँ भी हैं। केजरीवाल जमानत पर बाहर हैं, वे दोष मुक्त नहीं हुए। उनके मुख्यमंत्री कार्यालय जाने पर प्रतिबन्ध उसी समय लगा दिया गया, जब वे मुख्यमंत्री थे, ऐसी स्थिति में केजरीवाल फिर से दिल्ली के मुख्यमंत्री बनेंगे, इसकी गुंजाइश भी नहीं है।

आम आदमी पार्टी के समक्ष एक बड़ी चुनौती यह भी है कि इस बार के चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के अलावा बहुजन समाज पार्टी और औवेसी की पार्टी भी मैदान में है। यह दोनों राजनीतिक दल जितने प्रभावी होंगे, उसका खामियाजा आम आदमी पार्टी को ही भुगतना होगा। एक गणित यह भी है कि पिछले चुनाव में अंदरूनी तौर पर कांग्रेस पार्टी का समर्थन आम आदमी पार्टी को मिला लेकिन इस बार पूरी गंभीरता के साथ कांग्रेस चुनावी मैदान में है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने केजरीवाल के समक्ष वजनदार प्रत्याशी उतार कर यह संदेश तो दिया कि इस बार केजरीवाल की पार्टी आसानी से विजय प्राप्त नहीं करेगी। क्योंकि बसपा और औवेसी के आने से केजरीवाल की पार्टी को मुस्लिम और दलित मत हासिल करने में कमी आ सकती है। ये मतदाता अतीत में कांग्रेस के वोटर रहे हैं, जिससे लगता है कि इसबार यह मतदाता कांग्रेस को ही वोट देगा।

आम आदमी पार्टी के साथ यह विसंगति जुड़ती जा रही है कि वह गठबंधन का हिस्सा केवल उन राज्यों में है, जहाँ आम आदमी पार्टी का अस्तित्व नहीं है। जहाँ केजरीवाल की पार्टी का अस्तित्व है, वहां गठबंधन के मायने बदल जाते हैं। इसका तात्पर्य यही है कि केजरीवाल स्वार्थ सिद्धि के लिए ही गठबंधन करते हैं। यह बात सही है कि केजरीवाल को अब राजनीति की समझ आ गई है। वे एक चतुर राजनीतिक नेता की तरह चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन विपक्ष की एकता के सपने को चकनाचूर कर रहे हैं। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक गठबंधन में दरार आने का ठीकरा कांग्रेस पर फोड़ रहे हैं। कुल मिलाकर यह कहना उचित होगा कि गठबंधन अब बिखरने की ओर है।

खैर, मूल विषय रेवड़ी का है। मुफ्त की रेवड़ी बांटना निश्चित ही इस बात की ओर संकेत करता है कि आज राजनीतिक दलों ने आम जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता खोई है इसीलिए चुनाव जीतने के जनता को प्रलोभन देकर वोट कबाड़ने की राजनीति की जा रही है। अब देखना यह है दिल्ली का सिंहासन किसका इंतजार कर रहा है। फिलहाल यही समझा जा रहा है कि मुख्य मुकाबला भाजपा और आदमी पार्टी के बीच है। प्रचार के लिए भाजपा के पास नेताओं की भारी भरकम फौज है तो आम आदमी पार्टी के पास केवल केजरीवाल हैं। चुनावी प्रचार के माध्यम से भाजपा अपनी बात को नीचे तक पहुंचाने का प्रयास करेगी और इसका प्रभाव भी हो सकता है। लेकिन फिर वही बात, क्या रेवड़ी के सहारे ही इस बार भी दिल्ली की सरकार बनेगी।

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