Article – Rashtriya Samasya https://rashtriyasamasya.com Rashtriya Samasya Wed, 29 Jan 2025 08:06:05 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.4 https://rashtriyasamasya.com/wp-content/uploads/2024/08/cropped-rastriya-32x32.png Article – Rashtriya Samasya https://rashtriyasamasya.com 32 32 महात्मा गांधी का पुण्य स्मरण  https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%b8%e0%a5%8d/ https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%b8%e0%a5%8d/#respond Wed, 29 Jan 2025 08:06:04 +0000 https://rashtriyasamasya.com/?p=8522 पू की स्मृति सात्विक मूल्यों के लिए सतत संघर्ष की याद दिलाती है। सत्य, अहिंसा, अस्तेय (चोरी न करना), अपरिग्रह (जरूरत से ज्यादा धन-सम्पदा न रखना), प्राकृतिक संसाधनों का दोहन न करना, शारीरिक श्रम, आपसी सौहार्द बनाए रखना गांधी जी के जीवन सूत्र थे। इनको लेकर वे निजी सामाजिक जीवन में खुद चलते थे और अपने साथ के लोगों को उनको अपनाने के लिए कहते थे। उनकी संगति में बहुतेरों ने अपने लिए स्वदेशी विचार-व्यवहार को अपनाया भी। गांधी जी के प्रभाव में खादी और चरखा घर-घर प्रचलित हुआ। स्वावलंबन के लिए सबने व्रत लिया। विकेंद्रीकृत और प्रजातांत्रिक तरीके से स्थानीय स्तर पर सामाजिक जीवन चलाने के कई सफल प्रयोग भी उन्होंने किए। स्थानीय और वैश्विक के अंतर्सबंधों को मानवीय स्तर पर समझने की उनकी कोशिश अनोखी थी। सीधा-सादा, सच्चा और लोक की रक्षा को समर्पित उनकी नीति स्वभाव में समावेशी थी । उन्होंने एक मानवीय राजनीतिक संस्कृति का सूत्रपात किया और साहस के साथ उसे अपनाया। जीवन भर गांधी जी प्रयोग करते रहे और स्वयं को परखते रहे। उनके लिए ‘सर्व’ का कल्याण उचित अनुचित तय करने की कसौटी थी। इस तरह की सोच समय से आगे थी और स्वतंत्र भारत के कर्णधारों को कदाचित बहुत प्रिय नहीं थी इसलिए उसका हाशियाकरण उनके जीते जी ही शुरू हो गया था जिसे वह प्रकट भी कर रहे थे। स्वतंत्र भारत में मनाए गए पहले और अंतिम जन्म दिवस पर दो अक्तूबर 1947 को उन्होंने बड़े दुखी मन से अपनी मृत्यु की कामना की थी। कुछ महीनों बाद ही 1948 की जनवरी में उनके आकस्मिक और मर्मांतक दैहिक अवसान से देश के सम्मुख कई प्रश्न खड़े हुए। उनके विचार जीवित हैं और उनको स्मरण भी किया जाता है परंतु अब अनुष्ठान अधिक हैं और वास्तविकता के धरातल पर उनको उतारना बेहद मुश्किल हो रहा है। अब तो कई नेता देश की प्राथमिकता को दांव पर लगाने में भी लोग नहीं चूकते।

अपने मूल सैद्धांतिक स्वभाव से राजनीति जनार्दन की जनता की सेवा के लिए है और सरकार का दायित्व और काम मुख्यतः जनता की सुख-सुविधा की व्यवस्था को सुनिश्चित करना और उनके लक्ष्यों को पाने में मदद करना है। इस दृष्टि से नेतागिरी समाज को समर्पित जनसेवा का उपक्रम हो जाता है। सच्चाई और ईमानदारी देश के निर्माण और प्रगति का आधार होता है। यह दुखद सच्चाई है कि बदलते दौर में अब भारत की राजनीतिक पार्टियां देश सेवा से विराट हो कर व्यापार और उद्योग धंधे का रूप लेती जा रही हैं। अब इन पार्टियों के चुनाव प्रचार का नजारा वोट की फसल खरीदने के लिए बोली लगाने जैसा होता जा रहा है। चुनाव में भाग लेने वाली एक पार्टी हिसाब लगा कर वोट बेंचने के लिए मतदाताओं तक पहुंच कर उसको खरीदने का सौदा करती है। यह कहते हुए वैध या पात्र मतदाता का पंजीकरण किया जाता है और आश्वस्त किया जाता है कि अगर उनकी सरकार बनी तो उसे कुछ हज़ार रूपये ज़रूर दिए जाएंगे । इस तरह के अवैध और अनर्गल प्रयास यही साबित करते हैं कि छद्म, छल और कपट से वोट को खरीदना और बटोरना धोखेदार राजनेताओं की पसंदीदा शैली होती जा रही है। ऐसे में राजनीतिज्ञों की बिरादरी की साख तेजी से घट रही है और उन पर आम जनों का भरोसा घटता जा रहा है।

अब मंच, रैली और फोन आदि भिन्न-भिन्न तरीकों से मतदाताओं तक अधिकाधिक पहुंच बनाई जाती है। घर-घर चलते घनघोर प्रचार के साथ वादा, संकल्पों और गारंटियों के एक से एक तोहफों की घोषणाओं की भरमार होती है। पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, धर्माटन आदि को लेकर मुफ्त सुविधाओं की बरसात किश्तों में हो रही है। हर पार्टी दूसरी पार्टी से बढ़चढ़ कर दावे ठोंक रही है। जहां तक पुराने अधूरे वादों का सवाल है और अपनी असफलता का सवाल है उसका ठीकरा विपक्षी दल पर फोड़ना आम बात है। पार्टियां मतदाता को लुभाने और घेर कर अपने पक्ष में करने के सभी जुगाड़ लगा रही हैं। समानता और समता की दुहाई देने वाली पार्टियां जाति, धर्म और क्षेत्र का खुले आम फायदा उठा रही हैं। नागरिक सुविधाओं की कमी और अव्यवस्था से जूझ रहे मध्य वर्ग के लोगों को राजनैतिक पार्टियों के वादे कुछ राहत देने वाले लगते हैं तो गरीब और पिछड़े वर्ग के लोगों को बेहद प्रलोभित करने वाले होते हैं। उनको सम्मान राशि में रुपयों पैसों को लेकर तात्कालिक फायदा दिखता है और भोली भाली जनता उसी के हिसाब से वोट डालने के लिए अपना मन बनाती और बिगाड़ती रहती है। कोई राजनेता यह नहीं बताता कि इन वादों और गारंटियों की अनंत सूची के लिए धन कहां से आएगा और इसकी प्रक्रिया क्या होगी।

राजनैतिक विचारधारा से लगाव अब कोई मायने नहीं रखता। समाज, देश और मानवता आदि के व्यापक सरोकार वाली सोच अब पूरी तरह से हाशिए पर पहुंचती दिख रही है। साथ ही चर्चाओं में भी नैतिकता के जरूरी मानक की चेतना जाती रही। सार्वजनिक मंच राजनैतिक वाद-विवाद में होने वाली चर्चाएँ हास्यास्पद रूप से चरित्र-हनन पर केंद्रित होती जा रही हैं। सभी एक दूसरे पर कीचड़ उछलते हैं और विगत इतिहास के पन्नों से उदाहरण निकाल-निकाल कर एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। पर कौन छोटा है और कौन बड़ा यह कहना मुश्किल होता है क्योंकि सभी दलों के इतिहास ऐसी घटनाओं से भरे पड़े होते हैं और वर्तमान में बड़ी समानताएं दिखती हैं। उदाहरण के लिए अपराध की पृष्ठभूमि यानी दागी नेता लोगों को प्रश्रय देने की मजबूरी कमोबेश सभी दलों में दिखती है। उनकी पात्रता को लेकर संदेह होने पर भी उनसे भय के कारण मौका दिया जाता है। अनेक नेता लाज शर्म छोड़ अपने धन-दौलत की बदौलत पार्टियों से टिकट पाने में सफल हो जाते हैं और फिर जीतने के बाद धन-उगाही ही उनका राजनीतिक कर्म हो जाता है। अनेक पूर्व गरीब और वर्तमान में बने क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनेताओं के पास अथाह धन-सम्पत्ति जिस तरह एकत्र होती दिखती है वह छुपा नहीं है। चुनाव में प्रत्याशियों की सूची देखें तो लगता है करोड़पति अरबपति होना अब राजनीति में प्रवेश लेने की शर्त होने लगी है। आर्थिक जगत में इतने तरह के घोटाले होते रहे हैं कि लोगों का राजनीति और राजनेता से भरोसा उठता जा रहा है।

आज राजनैतिक परिवेश दारुण और पीड़ादायी हो रहा है। सत्ता और शक्ति का नशा गहराता जा रहा है। ऐसे में विकसित भारत के लक्ष्य के लिए शुचिता की शर्त याद रखनी होगी। चरित्र का निर्माण और मूल्यों की प्रतिष्ठा का कोई विकल्प नहीं है। महात्मा गांधी औपनिवेशिक सता के प्रतिरोध और हिंद-स्वराज की स्थापना का स्वप्न चरितार्थ कर सके थे। मनुष्य के रूप में दुर्बल काया परंतु दृढ़ आत्मबल से उन्होंने जो उद्यम किया वह मनुष्य की उदात्त और ऊर्ध्वमुखी यात्रा का अविकल प्रमाण है। असम्भव संभावना को संभव करते महात्मा गांधी आज भी अविश्वसनीय रूप से स्पृहणीय और प्रेरक हैं। मनुष्य के कर्तृत्व की शक्ति का कोई विकल्प नहीं है। पर इसके लिए विचार और कर्म के बीच की दूरी जो बढ़ती जा रही है उसे कम करना होगा। आत्म-परिष्कार और अपने अहं से परे जाने और सर्व को प्रतिष्ठित करने के लिए हमें अपने स्वार्थों का अतिक्रमण करना होगा।

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गांवों की दशा और दिशा बदल रही स्वामित्व योजना https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b5%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2-%e0%a4%b0/ https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b5%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2-%e0%a4%b0/#respond Tue, 28 Jan 2025 10:20:07 +0000 https://rashtriyasamasya.com/?p=8459 देश में ग्रामीण भूमि सर्वेक्षण और बंदोबस्त की समस्या प्रमुख रही है। कई राज्यों में गांवों के आबादी क्षेत्रों के नक्शे और दस्तावेजीकरण का अभाव रहा है। आधिकारिक रिकॉर्ड की अनुपस्थिति के कारण इन क्षेत्रों में संपत्ति के मालिक अपने घरों को अपग्रेड करने या अपनी संपत्ति को ऋण और अन्य वित्तीय सहायता के लिए वित्तीय संपत्ति के रूप में उपयोग करने में असमर्थ रहे हैं, जिससे उनके लिए संस्थागत ऋण प्राप्त करना मुश्किल रहा। इस तरह के दस्तावेजीकरण की कमी ने 70 से अधिक वर्षों तक ग्रामीण भारत के आर्थिक विकास में बाधा डाली। यह स्पष्ट हो गया कि आर्थिक सशक्तीकरण के लिए कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त संपत्ति रिकॉर्ड के महत्व के आलोक में एक समकालीन समाधान की आवश्यकता थी। गांवों के आबादी क्षेत्रों के सर्वेक्षण और मानचित्रण के लिए अत्याधुनिक ड्रोन तकनीक का उपयोग करने के लिए पीएम स्वामित्व योजना विकसित की गई है। इस योजना ने जल्द ही खुद को इस दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित कर दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले दिनों लाखों स्वामित्व दस्तावेज भू-मालिकों को सौंपे हैं।

पंचायतीराज मंत्रालय की एक केंद्रीय क्षेत्र की पहल को स्वामित्व (ग्रामीण क्षेत्रों में सुधारित प्रौद्योगिकी के साथ गांवों का सर्वेक्षण और मानचित्रण) कहा जाता है। इसे नौ राज्यों में कार्यक्रम के पायलट चरण (2020-2021) के सफल समापन के बाद 24 अप्रैल, 2021 को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस पर देश भर में पेश किया गया था। यह कार्यक्रम भूमि के टुकड़ों का मानचित्रण करने और गाँव के घरेलू मालिकों को “अधिकारों का रिकॉर्ड” प्रदान करने के लिए ड्रोन तकनीक का उपयोग करता है। कानूनी स्वामित्व कार्ड, जिन्हें संपत्ति कार्ड या शीर्षक विलेख के रूप में भी जाना जाता है, तब संपत्ति के मालिकों को जारी किए जाते हैं, जो ग्रामीण आबादी वाले (आबादी) क्षेत्रों में संपत्ति के स्पष्ट स्वामित्व की स्थापना की दिशा में एक सुधारात्मक क़दम है।

सर्वे ऑफ इंडिया और सम्बंधित राज्य सरकारों के बीच एक समझौता ज्ञापन स्वामित्व योजना को लागू करने के लिए रूपरेखा द्वारा प्रदान की गई बहुचरणीय संपत्ति कार्ड निर्माण प्रक्रिया में पहला कदम है। सभी पैमानों पर राष्ट्रीय स्थलाकृतिक डेटाबेस तैयार करने के लिए, विभिन्न पैमानों पर स्थलाकृतिक मानचित्रण के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करता है, जैसे उपग्रह इमेजरी, मानव रहित हवाई वाहन या ड्रोन प्लेटफॉर्म और हवाई फोटोग्राफी ड्रोन। समझौता ज्ञापन के पूरा होने के बाद, एक सतत संचालन संदर्भ प्रणाली स्थापित की जाती है। एक आभासी बेस स्टेशन जो लंबी दूरी की, अत्यधिक सटीक नेटवर्क आरटीके (रियल-टाइम किनेमेटिक) सुधार प्रदान करता है, संदर्भ स्टेशनों के इस नेटवर्क द्वारा प्रदान किया जाता है। अगला चरण यह निर्धारित करना है कि किन गांवों का सर्वेक्षण किया जाएगा और जनता को संपत्ति मानचित्रण प्रक्रिया के बारे में सूचित करना है। प्रत्येक ग्रामीण संपत्ति को चूना पत्थर (चुन्ना) से चिह्नित किया जाता है, जो गांव के आबादी क्षेत्र (आबाद क्षेत्र) को चित्रित करता है यह जांच / आपत्ति प्रक्रिया का समापन है, जिसे संघर्ष / विवाद समाधान के रूप में भी जाना जाता है। फिर सम्पत्ति पत्रक या अंतिम संपत्ति कार्ड / शीर्षक विलेख तैयार किए जाते हैं। आप इन कार्डों को खरीद सकते हैं।

इस कार्यक्रम के लाभों में एक समावेशी समाज शामिल है। गांवों में कमजोर आबादी की सामाजिक-आर्थिक स्थिति संपत्ति के अधिकारों तक उनकी पहुँच के साथ सकारात्मक रूप से सहसम्बद्ध है। स्वामित्व योजना इसे संभव बनाने का प्रयास करती है। आबादी की स्पष्ट रूप से परिभाषित सीमा की कमी के कारण भूमि-संघर्ष के मामलों की संख्या बहुत अधिक है। स्थानीय स्तर पर संघर्षों के अंतर्निहित कारणों को सम्बोधित करना स्वामित्व योजना का लक्ष्य है। बेहतर ग्राम पंचायत विकास योजनाएं जो उच्च-रिजॉल्यूशन वाले डिजिटल मानचित्रों का उपयोग करती हैं, सड़कों, स्कूलों, सामुदायिक स्वास्थ्य सुविधाओं, नदियों, स्ट्रीटलाइट्स और अन्य बुनियादी ढाँचे में सुधार लाती हैं। अधिक सुलभ संसाधनों और प्रभावी वित्तीय प्रबंधन के माध्यम से। लोगों को अपनी संपत्ति को संपार्श्विक के रूप में मुद्रीकृत करने में मदद करना मुख्य लक्ष्य है। इसके अतिरिक्त, जिन राज्यों में संपत्ति कर लगाया जाता है, वहाँ इसे सरल बनाने से निवेश को बढ़ावा मिलता है और व्यापार करना आसान हो जाता है, जिससे भारत की आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा मिलता है।

भूमि स्वामित्व से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे मुद्दों को विकास और सशक्तिकरण के अवसरों में बदलकर, स्वामित्व योजना ग्रामीण भारत की कहानी बदल रही है। यह योजना, जिसमें डिजिटल संपत्ति कार्ड और परिष्कृत ड्रोन सर्वेक्षण शामिल हैं, केवल सीमाओं और नक्शों के बजाय संभावनाओं और सपनों के बारे में है। स्वामित्व सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम से कहीं ज्यादा बन गया है क्योंकि गांव इस बदलाव का स्वागत करते हैं; यह बढ़ी हुई आजादी, ज्यादाा चतुराईपूर्ण योजना और ज़्यादा एकजुट, शक्तिशाली ग्रामीण भारत के पीछे एक प्रेरक शक्ति है। स्वामित्व योजना के परिणामस्वरूप ग्रामीण भारत बदल रहा है। भूमि स्वामित्व से जुड़ी लंबे समय से चली आ रही कठिनाइयां विकास और आत्मनिर्णय के अवसरों में बदल रही हैं। बाधाओं को दूर करने, विवादों को निपटाने और संपत्ति को आर्थिक उन्नति के लिए एक शक्तिशाली साधन में बदलने के लिए नवाचार और समावेशिता को जोड़ा जा रहा है। डिजिटल संपत्ति कार्ड और परिष्कृत ड्रोन सर्वेक्षण इस बात के दो उदाहरण हैं कि कैसे योजना सरल सीमाओं और मानचित्रों से आगे जाती है। यह अवसरों और आकांक्षाओं से भरपूर है। गांव इस बदलाव को अपना रहे हैं और स्वामित्व महज सरकारी कार्यक्रम से आगे बढ़ रहा है। आत्मनिर्भरता, बेहतर योजना और अधिक एकजुट ग्रामीण भारत सभी इसके द्वारा गति प्राप्त कर रहे हैं।

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हर बार सनातन की आस्था पर प्रहार https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%b9%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%8d/ https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%b9%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%8d/#respond Tue, 28 Jan 2025 07:56:09 +0000 https://rashtriyasamasya.com/?p=8390 कुंभ भारत की सनातन संस्कृति की अद्वितीय शक्ति, आध्यात्मिकता, सहिष्णुता और एकता का प्रतीक है । यह आत्मा की शुद्धता और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। भारत अपनी सनातन संस्कृति के लिए विश्व भर में जाना जाता है। यह कुंभ आत्मा के शुद्धिकरण और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति का माध्यम है ।कुंभ सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है बल्कि यह भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है ।

कुंभ मेला ‘ वसुधैव कुटुंबकम’ की उस अवधारणा को चरितार्थ करता है जिसमें संपूर्ण विश्व को स्वयं में समाहित करने की शक्ति है । देश दुनिया से अनेक लोग अपने-अपने आस्था- विश्वास की डोर को हाथों में थाम कर, अपने रीति- रिवाज, संस्कार, आचार- व्यवहार को अपने साथ लेकर भारत भूमि पर आए हैं और यहां का दृश्य देख वे आश्चर्य और विस्मय से भर गए हैं । वे देख रहे हैं कि भारत की सनातन संस्कृति किस तरह से अपनी बांहे खोल उनका स्वागत कर रही है। वे देख रहे है यहां की सामाजिक समरसता को जहां लिंग, जाति, धर्म, पंथ, संप्रदाय ,मत, अमीर-गरीब, पूरब – पश्चिम के भेद का कोई अर्थ नहीं है। यहां अनेक को एकाकार होते हुए देखा जा सकता है।

तीर्थराज प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ हमारी सनातन संस्कृति की आस्था और आध्यात्मिकता की जीवंत अभिव्यक्ति है परंतु ऐसे समय में भी हमारे देश का विपक्ष राजनीति करने से,सनातन की मान्यताओं का मखौल उड़ाने से बाज नहीं आ रहा है। कुंभ में भाजपा नेताओं के स्नान को डुबकी कह कर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने बता दिया है कि उन्हें सनातन धर्म की, उसकी परंपराओं की कितनी गहरी समझ है। वरना वे करोड़ों लोगों की आस्था को अपने शब्दों से आहत नहीं करते । उन्होंने कहा कि इस महाकुंभ में हजारों रुपये खर्च कर के कंपटीशन में भाजपा नेता डुबकी लगा रहे हैं और तब तक डुबकी लगाते हैं जब तक टीवी में अच्छा नहीं आ जाता। उनका मानना है कि धर्म के नाम पर गरीबों का शोषण हो रहा है । उन्होंने कहा कि क्या गंगा में डुबकी लगाने से गरीबी दूर हो सकती है ? क्या इससे पेट भरता है? उनका यह बयान उस दिन आया जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने महाकुंभ में संगम पर पवित्र स्नान किया।

वस्‍तुत: ऐसे ही बयान कांग्रेस और उसके नेताओं ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के समय दिये थे कि राम मंदिर बनने से क्या हो जाएगा? क्या लोगों को रोजगार मिल जाएगा,मंदिर की जगह अस्पताल की देश को जरूरत है आदि? आज उन्होंने गंगा स्नान पर इस तरह का बयान दिया है। बात सिर्फ महाकुंभ या राम मंदिर की नहीं है। हमेशा से विपक्ष और विपक्ष के नेताओं ने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सनातन की आस्था पर प्रहार करने का एक भी मौका नहीं छोड़ा है। ये लोग बताए कि क्या महाकुंभ में आने वाला हर एक व्यक्ति बीजेपी का है। हजारों वर्षों की कुंभ की परंपरा क्या बीजेपी ने शुरू की थी? क्या ये कह सकते है कि हज यात्रा करने से क्या हो जाएगा? जब बात दूसरे धर्म की धार्मिक मान्यताओं की, परंपराओं की होती है तब यह लोग कुछ नहीं कहते परन्तु जब बात सनातन की होती है तो इनके सामने देश की हर समस्या आ जाती है।इन्हें सनातन संस्कृति की हर एक मान्यता, हर एक प्रथा , प्रत्येक रीति रिवाज अंधविश्वास लगता है। ये अपने बयानों में उसका मजाक उड़ाते हैं। पिछले 15 दिनो में महाकुंभ में 14 करोड लोगों ने पवित्र स्ना न किया है ।क्या ये सभी 14 करोड लोग भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता है या योगी ,मोदी सरकार के लोग हैं । इसी के साथ करीब 62 देशों के दो लाख के करीब विदेशी अनुयायियो ने महाकुंभ में स्नान किया जिनमें कई प्रसिद्ध लोग भी है। क्या वह भी बीजेपी के हो गए ।

आज संपूर्ण दुनिया महाकुंभ के वैभव, सनातन की आस्था को देखकर विस्मित, नतमस्तक है ।लेकिन हमारे देश के हिंदू धर्म में ही पैदा हुए लोग महाकुंभ में पवित्र स्नान को डुबकी लगाना, अंधविश्वास कहते हैं। इन लोगों को ना देश की सांस्कृतिक विरासत का ज्ञान है, ना परंपरा की समझ है । लेकिन सवाल यही है कि हर बार सनातन पर ही प्रहार क्यों? क्यों हर बार सनातन की परंपरा, मूल्य, नायकों और संस्कृति को निशाना बनाकर प्रहार किया जाता है। भारत को एक सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में सारा विश्व जानता है राष्ट्र जिसकी एक संस्कृति, परंपरा, साहित्यिक अवधारणा आचार- विचार, व्यवहार होता है। इस संदर्भ में कुंभ महज एक मेला भर नहीं है। वह हजारों सालों से पोषित भारत की सनातन संस्कृति की वह परंपरा है जिसमें सनातन संस्कृति की आत्मा रची बसी है। अतः धर्मनिरपेक्षता का अर्थ किसी धर्म विशेष की आस्था पर प्रहार नहीं होता है। यह बात बड़े – बड़े बोल बोलने वाले और आस्था का अपमान करने वाले नेता जान लें तभी वे भी देश का और जनता का भला सोच पाएंगे।

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देश में शहरों का भू-रिकॉर्ड https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b6%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ad%e0%a5%82-%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%89%e0%a4%b0%e0%a5%8d/ https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b6%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ad%e0%a5%82-%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%89%e0%a4%b0%e0%a5%8d/#respond Mon, 27 Jan 2025 09:21:37 +0000 https://rashtriyasamasya.com/?p=8315 मनुस्मृति में राजाओं द्वारा भू-राजस्व संग्रह के उल्‍लेख से लेकर शेरशाह और मुगलकाल में राजा टोडरमलन द्वारा विकसित भू-अभिलेख प्रणाली, ब्रिटिशकाल के दौरान विकसित भू-माप प्रणाली और स्वतंत्रता के बाद विकसित भू-अभिलेख व्यवस्था के बाद से भारत ने ग्रामीण क्षेत्रों में अब पूर्णतया डिजिटल भू-रिकॉर्ड और मानचित्रण तक पहुंचने की लंबी यात्रा तय कर ली है। गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु तथा कुछ अन्य शहरों को छोड़कर भारत में शहरी भू-अभिलेख नहीं रखे जाते। अधिकांश रूप से उप पंजीयक कार्यालय में पंजीकृत संपत्ति का खरीद-बिक्री का ब्‍यौरा ही शहरी भू-अभिलेख का एकमात्र साधन है। पंजीकरण अधिनियम, 1908 के तहत कार्य करने वाले उप रजिस्ट्रार विक्रेता की जानकारी रखने के कुछ उचित उपाय करते हैं, लेकिन उन्हें उन सभी दस्तावेजों को पंजीकृत करना चाहिए जो उनके सामने प्रस्तुत किए जाते हैं। सरकारी भू-अभिलेखों के अभाव में शहरी भूमि संपत्ति के मामलों में धोखाधड़ी और विवाद की आशंका बनी रहती है।

भारत में तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहे महानगरीय बस्तियों के आसपास के गैर-शहरी इलाके (पेरी-अर्बन) में निजी डेवलपर्स कृषि भूमि को लेकर उन्‍हें कॉलोनियों में बदल रहे हैं। इन कॉलोनियों को स्थानीय अधिकारियों द्वारा योजनाबद्ध अनुमोदन के साथ या उसके बिना ही विकसित किया जा रहा है। अनधिकृत कॉलोनियों में एक ही प्लॉट की कई बार बिक्री के बहुत सारे मामले सामने आ रहे हैं। सरकारी भूमि अभिलेखों के न रहने से महंगी शहरी भूमि के मामले में अनिश्चितता, जोखिम, क्रेताओं को अनावश्‍यक परेशानी और मुकदमेबाजी होती है। कंप्‍यूटरकृत भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) से ड्रोन/विमान के माध्यम से पांच सेमी की सटीकता से अब भू-मानचित्र दो लाख रुपये प्रति किलोमीटर की उचित लागत पर 2-4 महीने की अवधि में तैयार किया जा सकता है। सरकारी अधिकारियों को ऐसे मानचित्रों का जमीनी सत्यापन करने और स्वामित्व दस्तावेजों को सत्यापित करने की आवश्यकता है। नगर पालिका संपत्ति कर डेटा स्वामित्व पर प्रारंभिक जानकारी प्रदान करता है। व्यक्तिगत भूखंड और मालिकाना विवरण के साथ विस्तृत नक्शे प्रकाशित करने के उपरांत, सार्वजनिक आपत्तियां आमंत्रित की जाती हैं।

शहर के सर्वेक्षण का कठिन हिस्सा जमीनी स्‍तर पर इनकी पहचान करना और स्वामित्व दस्तावेजों को प्रमाणित करना है। जमीनी सत्यापन के लिए बड़ी संख्या में टीमों को शामिल करने की आवश्‍यकता पड़ती है जिनमें सर्वेक्षक और सरकारी अधिकारी होते हैं। भौगोलिक सूचना प्रणाली आधारित नगर सर्वेक्षण में भी वास्तविक कब्जे वाली भूमि और अधिकार दस्तावेज के बीच अंतर पाया गया है। जीआईएस आधारित मापों की उच्चस्तरीय सटीकता में पांच प्रतिशत तक अंतर होता है। नए रिकॉर्ड में उनके कब्‍जे में कम भूमि दिखने के कारण भू-मालिक आपत्ति दर्ज करते हैं। इसके अतिरिक्‍त कई मामलों में भू-स्‍वामित्‍व स्पष्ट नहीं होता या इस पर विवाद रहता है।

शहरी भू-सर्वेक्षण में बड़ी जनशक्ति लगती है और भूमि स्‍वामित्‍व संबंधी आपत्तियों के सावधानीपूर्वक निपटान की आवश्यकता पड़ती है। राज्य सरकार की ओर से इसके लिए व्यापक राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता है। भारत सरकार के भूमि संसाधन विभाग (डीओएलआर) ने एक वर्ष में सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के 152 शहरों में नक्शा (एनएकेएसएचए) नामक शहर सर्वेक्षण पायलट कार्यक्रम आरंभ किया है। इसके बाद अगले चरण में 1000 शहरों में यह सर्वेक्षण किया जाएगा और 5 वर्षों में सभी 4912 शहरों में यह योजना चलाई जाएगी।

शहरी भूमि रिकॉर्ड और शहर के सर्वेक्षण से प्राप्‍त नक्शे नागरिकों को अधिकार प्रदान करते हैं। अन्य संबंधित डेटा जैसे मालिक/किरायेदार परिवार का विवरण, संपत्ति कर, भवन योजना अनुमोदन, बिजली, पानी और गैस को भी इसी आधार पर समेकित किया जा सकता है। इससे नागरिकों के जीवन में सुगमता आएगी और विभिन्न स्थानीय सरकारी एजेंसियों को उनके कार्य में सुविधा होगी।

कई कैमरों के साथ, शहरों की त्रिआयामी छवि और डिजिटल ट्विन उत्पन्न होते हैं। इनका उपयोग बेहतर संपत्ति कर मूल्यांकन और शहरी नियोजन के लिए किया जा सकता है। लेजर आधारित लिडार इमेजिंग ऊंचाई मानचित्रण प्रदान करती है जो शहरों में तूफान/बाढ़ के पानी की निकासी और आपदा की स्थिति में लोगों को सुरक्षित निकालने लिए बेहतर डिजाइन बनाने में सहायक होती है। यह परिवहन योजना, सड़क विकास, ढांचागत विकास के लिए भूमि अधिग्रहण और शहरी नियोजन के अन्य पहलुओं को सुगम बनाता है। भारत के कई शहरों में ड्रोन से चित्र लिए गए हैं, लेकिन शहरी स्थानीय निकाय (यूएलबी) में क्षमता की कमी से उनका इन उद्देश्यों के लिए उपयोग नहीं किया गया है। राज्यों और यूएलबी को जीआईएस प्रौद्योगिकियों और शहरी नियोजन में निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता लेने की आवश्यकता है। दस लाख की आबादी वाले शहर में इन कार्यों के लिए आवश्यक धनराशि 5 करोड़ रुपये से अधिक नहीं लगेगी। यह गहन प्रयास है जिसमें धन का इतना महत्‍व नहीं है। भारत अगले 5 वर्षों में हवाई इमेजरी के सरल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग से शहरी भूमि रिकॉर्ड सुव्‍यवस्थित करने, संपत्ति कर के बेहतर मूल्यांकन और शहरी नियोजन समाधान तथा बाढ़ शमन उपायों को विकसित करना चाहता है।

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दिल्ली के हर मतदाता के हाथ में लड्डू! https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a4%a4%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a5/ https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a4%a4%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a5/#respond Mon, 27 Jan 2025 09:17:27 +0000 https://rashtriyasamasya.com/?p=8312 दिल्ली में विधानसभा चुनाव बेहद अलग और दिलचस्प है। मौजूदा सरकार के सुप्रीमो केजरीवाल जैसी मुफ्त की रेवड़ियों का वादा अब तो सभी पार्टियां और राज्य न केवल करने लगे हैं बल्कि पूरा भी कर रहे हैं। ऐसे में यह चुनाव वाकई दिल्ली वालों के लिए हर हाथ में लड्डू जैसे होंगे। इतना है कि इस बार मुकाबला न केवल कांटे का बल्कि त्रिकोणीय सा बनता जा रहा है। लेकिन यह भी सच है कि सरकार किसी की बने लुभावनी योजनाओं का अंबार होगा। इससे दिल्ली की कितनी तकदीर बदलेगी यही देखने लायक होगा।

दिल्ली का चुनावी सफर भी दिलचस्प है। 1952 में पहली बार राज्य विधानसभा का गठन हुआ तब 48 सीटें थीं। कांग्रेस ने 36 सीटों पर जबरदस्त जीत दर्ज की। 34 वर्ष के चौधरी ब्रह्म प्रकाश मुख्यमंत्री बने जो नेहरू जी की पसंद थे। दरअसल कांग्रेस देशबंधु गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाना चाह रही थी लेकिन एक हादसे में उनकी मृत्यु के चलते ब्रह्म प्रकाश एक्सीडेंटल मुख्यमंत्री बने। बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले रेवाड़ी के निवासी ब्रह्म प्रकाश कभी भी मुख्यमंत्री आवास में नहीं रहे। बिना तामझाम काम करते और जनसाधारण के बीच रहते। 1955 में कांग्रेस ने गुरमुख निहाल सिंह को मुख्यमंत्री बनाया जो 1956 तक रहे। राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के चलते साल भर बाद दिल्ली विधानसभा भंग हुई। 1966 में इसकी जगह मेट्रोपोलिटन काउंसिल बनी। इसमें 56 निर्वाचित और पांच मनोनीत सदस्यों का प्रावधान था। लेकिन 1991 में 69वें संविधान संशोधन के जरिए दिल्ली विधानसभा की व्यवस्था हुई और 1992 में परिसीमन और 1993 में चुनाव हुए।

1993 में भाजपा बहुमत में आई। मदन लाल खुराना मुख्यमंत्री बने और 1956 के बाद दिल्ली को कोई मुख्यमंत्री मिला। लेकिन पांच साल में तीन मुख्यमंत्री बदले गए। खुराना को घोटाले के आरोपों के चलते कुर्सी छोड़नी पड़ी। फिर साहिब सिंह वर्मा आए और महंगाई के मुद्दे पर ऐसे घिरे कि उन्हें भी इस्तीफा देना पड़ा। इनके बाद सुषमा स्वराज को कमान मिली जो महज 52 दिन मुख्यमंत्री रहीं।

1998 के चुनाव में भाजपा ने सुषमा स्वराज को तो कांग्रेस ने शीला दीक्षित को आगे किया। कांग्रेस की जीत हुई और शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनीं। दिल्ली में फ्लाई ओवरों का जाल, मेट्रो रेल का विस्तार, डीजल की जगह सीएनजी के उपयोग को बढ़ावा और हरियाली पर खास ध्यान सहित दूसरे काम उनकी पहचान बने। 1998 से 2013 तक तीन बार लगातार दिल्ली की सत्ता पर कांग्रेस और शीला दीक्षित काबिज रहीं। इस बीच 2011 में जन लोकपाल विधेयक की मांग पर दिल्ली में अन्ना आंदोलन हुआ। अप्रैल में पांच दिन का आमरण अनशन और दोबारा 16 अगस्त से फिर अनशन बैठते ही देश भर में आन्दोलनों की दस्तक हुई। आखिर संसद में बिल पास हुआ और देखते-देखते अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, आतिशी और कई चेहरे भारतीय राजनीति के नए हीरो बन गए। आम आदमी पार्टी ने 2013 का दिल्ली चुनाव लड़ा और 15 वर्षों से काबिज कांग्रेस सरकार गिरा दी। 70 सीटों में भाजपा ने 32 जीती फिर भी बहुमत से दूर रही। आम आदमी पार्टी 28 सीटें जीतने के बाद कांग्रेस की 7 सीटों के समर्थन से सरकार बनाने में कामयाब रही और अन्ना आन्दोलन से उपजे केजरीवाल पहली बार मुख्यमंत्री बने।

कहते हैं राजनीति शह-मात का खेल है। आआपा और कांग्रेस की नहीं निभी। आखिर 49 दिन में सरकार गिर गई और राष्ट्रपति शासन लग गया। 2015 में फिर चुनाव हुए। इसमें दिल वालों की दिल्ली ने केजरीवाल पर अपनी उम्मीदों की बख्शीश खूब लुटाई। 70 में से 67 रिकॉर्ड सीटें जीतकर केजरीवाल भारतीय राजनीति के नए सितारे बन गए। भाजपा केवल तीन सीटें तो कांग्रेस खाता भी नहीं खोल पाई। केजरीवाल भी अपनी तमाम घोषणाओं पर अमल करते रहे। नतीजन 2020 में एक बार आम फिर आदमी पार्टी ने 62 सीटें तो भाजपा 8 से आगे नहीं बढ़ पाई। कांग्रेस शून्य पर ही रही। लुभावनी योजनाओं का असर दिखा। आआपा को फिर बहुमत मिला और केजरीवाल मुख्यमंत्री बने। इसके बाद विवादों में घिरे, जेल गए और मुख्यमंत्री पद छोड़ा। अब दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी भले हैं लेकिन पार्टी सुप्रीमो केजरीवाल ही हैं।

बेहतरीन सरकारी स्कूल, मोहल्ला क्लीनिक, महिलाओं को मुफ्त बस सुविधा, 200 यूनिट बिजली फ्री, 20 हजार लीटर मुफ्त पानी, बुजुर्गों का मुफ्त तीर्थ दर्शन जैसी अन्य योजनाओं के साथ नई-नई घोषणाएं करते केजरीवाल तो 1998 से 2013 तक के कार्यकाल को दिल्ली का स्वर्णिम काल बता कांग्रेस असली विकास और उपलब्धियां गिनाते नहीं थकती। भाजपा मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की तर्ज पर महिलाओं को हर महीने धनराशि देने, मौजूदा योजनाओं को न केवल जारी रखने बल्कि उसमें बढ़ोतरी करने जैसा संकल्प यानी एक से एक लुभावनी घोषणाओं का पिटारा खोल आम आदमी पार्टी को चुनौती देने में कोई कसर छोड़ते नहीं दिखती।

मुफ्त की रेवड़ियों, लोक-लुभावन घोषणाओं के बीच दिल्ली का प्रदूषण, यमुना की गंदगी, बदहाल सड़कें, बरसात में डूबते पुल-पुलिया, पीने के पानी की किल्लत, बढ़ते अपराध और इन सबसे ऊपर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा जैसे अहम मुद्दे काफी पीछे छूट गए हैं। काश! एक करोड़ की आबादी खातिर मौजूदा संसाधनों वाली दिल्ली में तीन करोड़ लोग कैसे रहते हैं को देखने, सुनने वाले जैसे आम आदमी के मुद्दों की भी बात होती। लेकिन फिलहाल माल-ए-मुफ्त, दिल-ए-बेरहम की तर्ज पर मतदाताओं को लुभाने में कोई पीछे नहीं दिखता। अब दिल्ली की बात कौन करे? देखने लायक होगा कि त्रिकोणीय मुकाबले में कौन किसको कितना नुकसान पहुंचाता है और बाजी जीतता है।

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हम सब भारत के लोग, भारत हम सबकी पहचान https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%b9%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a4%ac-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a4%ae/ https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%b9%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a4%ac-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a4%ae/#respond Sat, 25 Jan 2025 09:08:47 +0000 https://rashtriyasamasya.com/?p=8247 उत्सव और उल्लास आनंद देते हैं। भारत ने 26 जनवरी 1950 को पहला गणतंत्र दिवस मनाया था। संविधान 26 जनवरी के दिन पूरा प्रवर्तित हुआ। भारतीय संविधान सभा की आखिरी बैठक (26 नवम्बर 1949) में डाॅ. आम्बेडकर के प्रस्ताव पर मतदान हुआ और संविधान पारित हो गया। भूमि, जन और शासन से ही राष्ट्र नहीं बनते। जाति, मजहब, राजनीति और क्षेत्रीय आग्रह समाज तोड़ते हैं, संस्कृति ही इन्हें जोड़ती है।

संविधान निर्माता सनातन सांस्कृतिक क्षमता से परिचित थे। उन्होंने संविधान की हस्तलिखित प्रति में सांस्कृतिक राष्ट्रभाव वाले 23 चित्र सम्मिलित किए। मुखपृष्ठ पर राम और कृष्ण तथा भाग 1 में सिन्धु सभ्यता की स्मृति वाले मोहनजोदड़ो काल की मोहरों के चित्र हैं। भाग 2 नागरिकता वाले अंश में वैदिक काल के गुरूकुल आश्रम का दिव्य चित्र है। भाग 3-मौलिक अधिकार वाले पृष्ठ पर श्रीराम की लंका विजय व भाग 4-राज्य के नीति निर्देशक तत्वों वाले पन्ने पर कृष्ण अर्जुन उपदेश वाले चित्र हैं। भाग 5 में महात्मा बुद्ध, भाग 6 में स्वामी महाबीर और भाग 7 में सम्राट अशोक के चित्र हैं। भाग 8 में गुप्त काल, भाग 9 में विक्रमादित्य, भाग 10 में नालंदा विश्वविद्यालय, भाग 11 में उड़ीसा का स्थापत्य, भाग 12 में नटराज, भाग 13 में भगीरथ द्वारा गंगावतरण, भाग 14 में मुगलकालीन स्थापत्य, भाग 15 में शिवाजी और गुरू गोविन्द सिंह, भाग 16 में महारानी लक्ष्मीबाई, भाग 17 व 18 में क्रमशः गांधीजी की दाण्डी यात्रा व नोआखाली दंगों में शान्ति मार्च, भाग 19 में नेताजी सुभाष, भाग 20 में हिमालय, भाग 21 में रेगिस्तानी क्षेत्र व भाग 23 में लहराते हिन्दु महासागर की चित्रावलि है।

संविधान पारण के बाद अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद ने कहा “अब सदस्यों को संविधान की प्रतियों पर हस्ताक्षर करने हैं, एक हस्तलिखित अंग्रेजी की प्रति है, इस पर कलाकारों ने चित्र अंकित किये हैं, दूसरी छपी हुई अंग्रेजी व तीसरी हस्तलिखित हिन्दी की।” (संविधान सभा कार्यवाही खण्ड 12 पृष्ठ 4261) भारतीय संस्कृति और इतिहास के छात्रों के लिए संविधान की चित्रमय प्रति प्रेरक हैं। डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा के आखिरी भाषण (26.11.1949) में कहा, “संविधान किसी बात के लिए उपबंध करे या न करे, देश का कल्याण उन व्यक्तियों पर निर्भर करेगा, जो देश पर शासन करेंगे।” उन्होंने दो बातों को लेकर खेद व्यक्त किया, “केवल दो खेद की बाते हैं। मैं विधायिका के सदस्यों के लिए कुछ योग्यताएं निर्धारित करना पसंद करता। असंगत है कि विधि के शासन में सहायकों के लिए हम उच्च अर्हता का आग्रह करें लेकिन विधि निर्माताओं के लिए निर्वाचन के अलावा कोई अर्हता न रखें। विधि निर्माताओं के लिए बौद्धिक उपकरण अपेक्षित हैं। सामर्थ्य व चरित्र बल भी। दूसरा खेद यह है कि हम अपना संविधान भारतीय भाषा में नहीं बना सके।”

संविधान सभा के आखिरी भाषण में डाॅ. अम्बेडकर ने भी प्राचीन भारतीय परम्परा की याद दिलाते हुए कहा था “एक समय था जब भारत गण राज्यों से सुसज्जित था। यह बात नहीं है कि भारत पहले संसदीय प्रक्रिया से अपरिचित था।” भारत संसदीय प्रक्रिया से पहले भी सुपरिचित था। यहां वैदिक काल से ही एक परिपूर्ण गणव्यवस्था थी। गणेश गणपति थे। प्राचीनतम ज्ञान अभिलेख ऋग्वेद में “गणांना त्वां गणपतिं” आया है। मार्क्सवादी चिंतक डाॅ. रामविलास शर्मा ने लिखा है “गण पुराना शब्द है, यह पुरानी समाज व्यवस्था का द्योतक है। गण और जन ऋग्वेद में पारिभाषिक हो गये हैं।” महाभारत युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने भीष्म से आदर्श गणतंत्र के सूत्र पूछे। भीष्म ने (शांतिपर्वः 107.14) बताया कि भेदभाव से ही गण नष्ट होते हैं। उन्हें संघबद्ध रहना चाहिए। गणतंत्र के लिए बाहरी की तुलना में आंतरिक संकट बड़ा होता है-‘आभ्यन्तरं रक्ष्यमसा बाह्यतो भयम्’ बाह्य उतना बड़ा नहीं।

संविधान निर्माताओं ने संसदीय जनतंत्र अपनाया है। उन्होंने अनेक संवैधानिक संस्थाओं का प्रावधान किया है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के मध्य शक्ति के पृथक्करण का सिद्धांत लागू है। निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाएँ सारी दुनिया में प्रतिष्ठित हैं। संसद विधायी और संविधायी अधिकारों से लैस है। संवैधानिक संस्थाएँ आदरणीय है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा प्रवेश के पहले दिन संसद भवन की सीढ़ियों पर साष्टांग प्रणाम किया था। यह प्रेरक और ऐतिहासिक है। संविधान निर्माताओं ने संसद को सविधान संशोधन का भी अधिकार दिया है। मोदी की सरकार ने संविधान के अनुच्छेद-370 को हटाने की कार्यवाही पूरी कर ली है। इसे हटाना संविधान निर्माताओं का ही स्वप्न था। उन्होंने इसके शीर्षक में ’अस्थायी उपबंध’ शब्द जोड़े थे। जम्मू-कश्मीर की आम जनता इससे प्रसन्न है लेकिन अलगाववादी शक्तियाँ अभी भी सक्रिय हैं। सीएए (नागरिकता संशोधन कानून) की भी कुछ ताकतें खुल्लमखुल्ला विरोध कर रही थी। संसद द्वारा किसानों के हित में पारित कानूनों को लेकर भी कुछ सरकारों ने गलत विरोध किया। कुछ अलगाववादी देशतोड़क ताकतें बार-बार सिर उठाती हैं। ऐसी ताकतें संविधान की सर्वोपरिता का सिद्धांत नहीं मानती हैं।

भारतीय गणतंत्र लगातार विकसित हो रहा है। न्यायपालिका संविधान की जिम्मेदार संरक्षक है। हिन्दुत्व की व्याख्या व नौवीं अनुसूची के दुरुपयोग को रोकने सहित अनेक मसलों पर न्यायपीठ ने प्रशंसनीय फैसले किये हैं। मौलिक अधिकार सुरक्षित है। कृषि, विकास, गोवंश संवर्द्धन राज्य के नीति निर्देशक संवैधानिक तत्व हैं। महाभारतकार ने गणतंत्र की सभा समिति (संसदीय व्यवस्था) के सदस्य की अनिवार्य योग्यता बतायी थी “न नः स समितिं गच्छेत यश्च नो निर्वपेत्कृषिम-जो खेती नहीं करता वह सभा में प्रवेश न करे।” ऋग्वैदिक काल में ऋषि भी कृषि करते थे। कॉमन सिविल कोड नीति निर्देशक तत्व है। हिदुत्व इस देश का प्राण तत्व है लेकिन साम्प्रदायिक कहा जाता है। अलगाववाद देशतोड़क है तो भी सेकुलर है। गहन आत्मचिन्तन ही एकमेव विकल्प है।

संविधान में देश के प्रत्येक नागरिक को मौलिक अधिकारों की प्रतिभूति है। लेकिन इसी के साथ संविधान के अनुच्छेद-51क में मूल कर्तव्यों की भी सूची है। इस सूची में कहा गया है कि ’’प्रत्येक नागरिक का मूल कर्तव्य है कि वह संविधान के पालन के साथ उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज व राष्ट्रगान का आदर करें। स्वाधीनता के राष्ट्रीय आन्दोलन के आदर्शों को हृदय में संजोये और उनका पालन करें। राष्ट्र की सम्प्रभुता, एकता और अखण्डता की रक्षा करे। किसी भी तरह के भेदभाव से परे भारत के सभी लोगों में समरसता और भाईचारा की भावना का विकास करे। पर्यावरण की रक्षा करे, सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करे। हिंसा से दूर रहें।’’ मूल कर्तव्यों की यह सूची भारत के लोक जीवन को आनन्दित करने का दस्तावेज है। संविधान दिवस के अवसर पर इसका पाठ और पुनर्पाठ बहुत जरूरी है।

संविधान की उद्देशिका स्मणीय है। उद्देशिका में ’हम भारत के लोग’ शब्द का प्रयोग ध्यान देने योग्य है। भारत की जनता के लिए किसी जाति सम्प्रदाय या वर्ग शब्द का प्रयोग नहीं है। हम सबकी पहचान भारत है। ’हम सब भारत के लोग’ हैं। उद्देशिका में सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त कराने के लिए संकल्प है। इनमें प्रतिष्ठा और अवसर की समता है। उद्देशिका एक तरह से हमारी राजव्यवस्था का स्वप्न है। यह बारम्बार विचारणीय और माननीय है। संविधान भारत का राजधर्म है।

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आखिर कब समझेंगे हम गणतंत्र की मूल भावना https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%86%e0%a4%96%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%ac-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%9d%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a4%ae-%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d/ https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%86%e0%a4%96%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%ac-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%9d%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a4%ae-%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d/#respond Sat, 25 Jan 2025 09:05:09 +0000 https://rashtriyasamasya.com/?p=8244 76वें गणतंत्र दिवस पर विशेष

प्रतिवर्ष की भांति एक और गणतंत्र दिवस हमारी चौखट पर दस्तक दे चुका है। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रत्येक राष्ट्रप्रेमी के लिए यह गर्व का दिन है क्योंकि भारत ने देश की आजादी के बाद स्वयं का संविधान बनाकर 26 जनवरी 1950 के दिन इसे लागू कर इसी दिन प्रभुत्ता सम्पन्न सार्वभौमिक प्रजातंत्रात्मक गणराज्य बनने का गौरव हासिल किया था। 26 जनवरी का दिन गणतंत्र दिवस के रूप मनाने की शुरूआत के पीछे मूल भावना यही थी कि देश का प्रत्येक नागरिक इस दिन संविधान की मर्यादा की रक्षा करने, स्वयं को देशसेवा में समर्पित करने तथा राष्ट्रीय हितों के प्रति आस्था का संकल्प ले, साथ ही इन पर अमल करे लेकिन विडम्बना है कि गौरवान्वित कर देने वाले इस विशेष अवसर पर ऐसे संकल्पों को प्रतिवर्ष दोहरा कर या स्मरण मात्र करते हुए हम अपने कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों की इतिश्री कर लेते हैं।

सही मायनों में गणतंत्र की मूल भावना को हमने आज तक समझा ही नहीं। ‘गणतंत्र’ का अर्थ है शासन तंत्र में जनता की भागीदारी। हालांकि हम कह सकते हैं कि शासन तंत्र में जनता को पूर्ण भागीदारी मिली है किन्तु क्या यह वाकई पूर्ण सत्य है? देश का संविधान लागू होने के इन 75 वर्षों में भी क्या वास्तव में शासन तंत्र में जनता की भागीदारी सुनिश्चित हुई है? जनता को यह तो अधिकार है कि मतदान के जरिये वह अपना जनप्रतिनिधि चुने किन्तु एक बार संसद अथवा विधानसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद अगले पांच वर्षों तक इन जनप्रतिनिधियों पर उसका क्या कोई अंकुश रह जाता है? वास्तविकता यही है कि इसी प्रावधान का लाभ उठाते हुए राजनीतिक दल देश की जनता का चुनाव के समय महज एक वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल करते आए हैं और अपना मतलब निकलने पर जनप्रतिनिधियों पर जनता के दुख-दर्द के बजाय अपने लिए सुख-सुविधाओं का अंबार जुटाने की चिंता सवार हो जाती है और वे इसी कवायद में जुट जाते हैं कि येन-केन-प्रकारेण अगले चुनाव के लिए कैसे करोड़ों रुपयों का इंतजाम किया जाए।

अहम सवाल यह है कि जिस राष्ट्र में जनता की भागीदारी चुनाव में सिर्फ वोट डालने और उसके बाद चुने हुए जनप्रतिनिधियों के आचरण से शर्मसार होकर आंसू बहाने तक सीमित रह गई हो, वहां ‘गणतंत्र’ का भला क्या महत्व रह गया है? खासतौर से ऐसी स्थिति में, जब गरीबी व भुखमरी से त्रस्त करोड़ों लोग चंद रुपयों की खातिर या लाखों लोग महज दो-चार शराब की बोतलों के लिए अपने वोट बेच डालते हों या ईवीएम के दौर में भी कुछ मतदान केन्द्रों पर गुंडागर्दी के बल पर वोट डलवाये जाते हों?

हालांकि इसमें संशय नहीं कि हमें विशुद्ध रूप में एक प्रजातांत्रिक संविधान प्राप्त हुआ है, जिसमें प्रत्येक वर्ग, प्रत्येक समुदाय, प्रत्येक सम्प्रदाय के लोगों के लिए बराबरी के अधिकार के साथ-साथ व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से कुछ मूलभूत स्वतंत्रताओं की व्यवस्था भी की गई है, प्रत्येक नागरिक के लिए मूल अधिकारों का प्रावधान किया गया है किन्तु गणतांत्रिक भारत में पिछले 75 वर्षों के हालात का विवेचन करें तो यही पाते हैं कि हमारे कर्णधार एवं नौकरशाह किस प्रकार संविधान के कुछ प्रावधानों के लचीलेपन का अनावश्यक लाभ उठाकर कदम-कदम पर लोकतांत्रिक मूल्यों को तार-तार करते रहे हैं। निःसंदेह इससे लोकतंत्र की गरिमा प्रभावित होती रही है। संविधान निर्माताओं ने कभी इस बात की कल्पना नहीं की होगी कि जिन लोगों के कंधों पर संविधान को लागू कराने की जिम्मेदारी होगी, वही इसके प्रावधानों का मखौल उड़ाते नजर आएंगे। ऐसी दयनीय परिस्थितियों को देखकर निश्चित रूप से संविधान निर्माताओं की आत्मा खून के आंसू रोती होगी।

संसद-विधानसभाओं में एक-दूसरे के साथ मारपीट, घूंसेबाजी, चप्पल, माइक इत्यादि से प्रहार, कुर्सियां फेंकने जैसी घटनाएं भारतीय लोकतंत्र में शर्मनाक पैठ बना चुकी हैं। वक्त-बेवक्त संसद और विधानसभाओं के भीतर होती गुंडागर्दी सरीखी घटनाएं दुनियाभर में हमें शर्मसार करती रही हैं। जिस राष्ट्र में कानून बनाने वाले और देश चलाने वाले लोग ही ऐसी असभ्य हरकतें करने लगें, वहां अपराधों पर अंकुश लगाने की किससे अपेक्षा की जाए? संसद-विधानसभा सरीखे लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिरों में अपराधियों व बाहुबलियों का निर्बाध प्रवेश क्या एक स्वस्थ लोकतंत्र का संकेत है? चुनाव जीतने के लिए आज हर राजनीतिक दल में ऐसे लोगों को पार्टी में शामिल करने, चुनाव जीतने के लिए उनका इस्तेमाल करने के अलावा उन्हें ही पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़वा कर अपनी सीटें बढ़ाने के फेर में ऐसे दागी लोगों को लोकतंत्र के मंदिरों में प्रवेश दिलाने की होड़-सी लगी है। अदालतें जब भी संसद या विधानसभाओं में आपराधिक तत्वों का प्रवेश रोकने की दिशा में कुछ सार्थक पहल करने की कोशिश करती हैं, तमाम राजनीतिक दल उसे संसद के अधिकार क्षेत्र में न्यायिक दखलंदाजी करार देते हुए हो-हल्ला मचाने लगते हैं।

राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सांसदों-विधायकों की रुचि लगातार कम हो रही है। प्रत्येक संसद सत्र में हंगामा व शोरशराबा करके संसद का बेशकीमती समय नष्ट कर देना जैसे एक परम्परा बन चुकी है। सदन से बहुत से सदस्य लंबे-लंबे समय तक गैरहाजिर रहते हैं। सर्वसम्मति के अभाव में देशहित से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण बिल लंबे समय तक लटके पड़े रहते हैं लेकिन आश्चर्य की बात है कि जब जनप्रतिनिधियों के वेतन-भत्ते अथवा अन्य ऐशोआराम की सुविधाएं बढ़ाने की बात आती है तो पूरा सदन एकजुट हो जाता है और ऐसे मामलों में पलक झपकते ही सर्वसम्मति बन जाती है। तब सदन में सदस्यों की उपस्थिति संख्या भी देखते ही बनती है। एक समय था, जब संसद में राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सकारात्मक बहस होती थी लेकिन अब हर संसद सत्र हंगामे और शोरशराबे की भेंट चढ़ जाता है।

इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि संसद का एक-एक मिनट बहुमूल्य होता है। संसद के प्रत्येक मिनट के कामकाज पर ढाई लाख रुपये से अधिक खर्च होते हैं अर्थात् आठ घंटे की संसद की कार्रवाई पर बारह करोड़ रुपये से भी अधिक खर्च होते हैं। आए दिन इसी तरह संसद में हंगामे होने, सदन की कार्यवाही का बहिष्कार करने या सदन की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित होने से देश को कितना आर्थिक नुकसान होता है, इसका अनुमान सहजता से लगाया जा सकता है। संसद अथवा विधानसभाओं की कार्यवाही पर होने वाला यह भारी-भरकम खर्च जनप्रतिनिधियों की जेबों से नहीं निकलता बल्कि इसका सारा बोझ देश की आम जनता वहन करती है।

बहरहाल, सबसे बड़ा सवाल यही है कि ‘गणतंत्र’ की जो तस्वीर हमारे जनप्रतिनिधियों द्वारा प्रस्तुत की जा रही है, क्या हम उस पर गर्व कर सकते हैं? गणतंत्र दिवस जैसे महत्वपूर्ण अवसर को इतनी धूमधाम से मनाए जाने का सही लाभ तभी है, जब न केवल देश का प्रत्येक नागरिक बल्कि बड़े-बड़े राजनेता और नौकरशाह भी संविधान की गरिमा को समझें और उसके अनुरूप अपने आचरण में पारदर्शिता भी लाएं।

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आत्मनिर्भरता के साथ रक्षा क्षेत्र में भारत की मजबूती https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ad%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a5%8d/ https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ad%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a5%8d/#respond Fri, 24 Jan 2025 10:25:53 +0000 https://rashtriyasamasya.com/?p=8135 हमारा राष्ट्र पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन जैसे दुश्मनों से घिरा हुआ है, जो सीमाओं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संचालन के विभिन्न तरीकों का उपयोग करके हमारे महान राष्ट्र को कमजोर करने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं। साथ ही विभिन्न राज्यों में उग्रवादी नक्सलियों को विकसित कर रहे हैं, विभिन्न राज्यों में अशांति पैदा करने के लिए बौद्धिक शहरी नक्सलियों को भी विकसित कर रहे हैं। हम पहले से जानते हैं कि यदि कोई देश सैन्य रूप से कमजोर है और उसके पास मजबूत हथियार, आयुध और गोला-बारूद की कमी है तो अन्य देश स्थिति का लाभ उठाएँगे, जैसा कि हमने 2014 से पहले देखा है। मोदी शासन के पिछले दस वर्षों में स्थिति बदल गई है। आईए देखें कि हमारी रक्षा स्थिति सैन्य और वित्तीय दोनों रूप से कैसे बदल गई।

रक्षा में आत्मनिर्भरता के प्रति भारत का समर्पण एक प्रमुख हथियार आयातक से स्वदेशी निर्माण के उभरते केंद्र में इसके परिवर्तन से प्रदर्शित होता है। वित्त वर्ष 2023-24 में रक्षा मंत्रालय ने रणनीतिक सरकारी नीतियों द्वारा संचालित घरेलू रक्षा उत्पादन में रिकॉर्ड 1.27 लाख करोड़ की वृद्धि दर्ज की। पहले अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहने वाला भारत अब अपनी सुरक्षा मांगों को पूरा करने के लिए आत्मनिर्भर विनिर्माण को प्राथमिकता देता है, जो राष्ट्रीय लचीलापन सुधारने और बाहरी स्रोतों पर निर्भरता कम करने की उसकी महत्वाकांक्षा की पुष्टि करता है।

भारत के रक्षा उत्पादन में वृद्धि

वित्त वर्ष 2023-24 के दौरान मूल्य के संदर्भ में स्वदेशी रक्षा उत्पादन में अब तक की सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की, जिसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य से सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों के सफल कार्यान्वयन को जाता है। डीपीएसयू, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों और निजी कंपनियों के आंकड़ों के अनुसार, रक्षा उत्पादन 2014-15 में 46,429 करोड़ रुपये से 174% बढ़कर 1,27,265 करोड़ रुपये के नए उच्च स्तर पर पहुंच गया है। ऐतिहासिक रूप से, भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर दूसरे देशों पर निर्भर रहा है, जिसमें लगभग 65-70% रक्षा उपकरण आयात किए जाते थे। हालाँकि, माहौल काफी बदल गया है, अब 65% से अधिक रक्षा उपकरण भारत में बनाए जाते हैं। यह परिवर्तन इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए देश की प्रतिबद्धता को दर्शाता है और इसके रक्षा औद्योगिक आधार की ताकत को उजागर करता है, जिसमें 16 रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयाँ (DPSU), 430 से अधिक लाइसेंस प्राप्त कंपनियाँ और लगभग 16,000 सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) शामिल हैं।

उल्लेखनीय रूप से इस उत्पादन का 21% निजी क्षेत्र से आता है, जो भारत के आत्मनिर्भरता के मार्ग को बढ़ावा देता है। धनुष आर्टिलरी गन सिस्टम, एडवांस्ड टोड आर्टिलरी गन सिस्टम (एटीएजीएस), मुख्य युद्धक टैंक (एमबीटी) अर्जुन, लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) तेजस, पनडुब्बियां, फ्रिगेट, कोरवेट और हाल ही में कमीशन किए गए आईएनएस विक्रांत जैसे प्रमुख रक्षा प्लेटफॉर्म मेक इन इंडिया पहल के हिस्से के रूप में विकसित किए गए हैं, जो भारत की बढ़ती रक्षा क्षेत्र की क्षमताओं को प्रदर्शित करते हैं। वार्षिक रक्षा उत्पादन ₹1.27 लाख करोड़ से अधिक हो गया है और चालू वित्त वर्ष में ₹1.75 लाख करोड़ को पार करने की उम्मीद है। भारत का लक्ष्य 2029 तक रक्षा उत्पादन को बढ़ाकर ₹3 लाख करोड़ करना है, जिससे वह खुद को दुनिया भर में विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित कर सके। भारत का रक्षा निर्यात वित्त वर्ष 2013-14 में ₹686 करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2023-24 में ₹21,083 करोड़ हो गया है, यह उपलब्धि सरकार द्वारा किए गए प्रभावी नीतिगत सुधारों, पहलों और व्यापार करने में आसानी में सुधार का परिणाम है, जिसका लक्ष्य रक्षा में आत्मनिर्भरता हासिल करना है।

पिछले वित्त वर्ष की तुलना में रक्षा निर्यात में 32.5% की वृद्धि हुई, जो ₹15,920 करोड़ थी। भारत के निर्यात पोर्टफोलियो में उन्नत रक्षात्मक उपकरणों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है, जैसे बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट, डोर्नियर (Do-228) विमान, चेतक हेलीकॉप्टर, त्वरित इंटरसेप्टर नौकाएं और हल्के टॉरपीडो। एक उल्लेखनीय विशेषता रूसी सेना के उपकरणों में ‘मेड इन बिहार’ बूटों को शामिल करना है, जो वैश्विक रक्षा बाजार में भारतीय उत्पादों के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर का प्रतिनिधित्व करता है, साथ ही देश के मजबूत विनिर्माण मानकों को भी प्रदर्शित करता है।

भारत वर्तमान में 100 से अधिक देशों को निर्यात करता है, जिसमें 2023-24 में रक्षा निर्यात के मामले में संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस और आर्मेनिया पहले से तीसरे स्थान पर हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का लक्ष्य 2029 तक रक्षा निर्यात को 50,000 करोड़ रुपये तक बढ़ाना है l प्रमुख सरकारी पहल हाल के वर्षों में, भारत सरकार ने देश की रक्षा उत्पादन क्षमता बढ़ाने और आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य से कई परिवर्तनकारी परियोजनाएँ शुरू की हैं। इन नीतियों का उद्देश्य निवेश आकर्षित करना, घरेलू विनिर्माण में सुधार करना और खरीद प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की सीमाओं को उदार बनाने से लेकर स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा देने तक, ये कदम भारत के रक्षा औद्योगिक आधार को मजबूत करने के लिए एक मजबूत प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करते हैं।

निम्नलिखित बिंदु उन महत्वपूर्ण सरकारी प्रयासों का सारांश देते हैं जिन्होंने रक्षा क्षेत्र में विकास और नवाचार को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उदारीकृत FDI नीति: 2020 में, रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की सीमा को नए रक्षा औद्योगिक लाइसेंस चाहने वाली कंपनियों के लिए स्वचालित मार्ग के माध्यम से 74% तक बढ़ा दिया गया था और आधुनिक तकनीकों तक पहुँच की उम्मीद करने वालों के लिए सरकारी मार्ग के माध्यम से 100% तक बढ़ा दिया गया था। 9 फरवरी, 2024 तक, रक्षा फर्मों ने ₹5,077 करोड़ का एफडीआई घोषित किया है। रक्षा मंत्रालय का 2024-25 के लिए बजट आवंटन ₹6,21,940.85 करोड़ है, जो कि मौजूदा बजट सत्र के दौरान संसद में पेश की गई “अनुदान मांग” का हिस्सा है।

घरेलू खरीद को प्राथमिकता: रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (डीएपी)-2020 घरेलू स्रोतों से पूंजीगत उत्पादों की खरीद पर जोर देती है।

सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियाँ: सेवाओं की कुल 509 वस्तुओं और रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (डीपीएसयू) से 5,012 वस्तुओं की पाँच ‘सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियों’ की अधिसूचना, निर्दिष्ट समय सीमा के बाद आयात पर प्रतिबंध के साथ तैयार की गई है।

सरलीकृत लाइसेंस प्रक्रिया: औद्योगिक लाइसेंस प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना और लंबी वैधता अवधि प्रदान करना। निष्कर्ष रक्षा में आत्मनिर्भरता के लिए भारत का मार्ग आयात पर निर्भरता से आत्मनिर्भर विनिर्माण केंद्र बनने की ओर एक क्रांतिकारी बदलाव को दर्शाता है। घरेलू उत्पादन और निर्यात में रिकॉर्ड परिणाम राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने और मजबूत रक्षा उपायों के माध्यम से आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करते हैं।

रणनीतिक नीतियों के साथ, स्वदेशीकरण पर बढ़ते जोर और एक संपन्न रक्षा औद्योगिक आधार के साथ, भारत न केवल अपनी सुरक्षा मांगों को पूरा करने के लिए अच्छी स्थिति में है बल्कि वैश्विक हथियार बाजार में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभरने के लिए भी तैयार है। भविष्य के उत्पादन और निर्यात के लिए स्थापित किए गए ऊंचे लक्ष्य दुनिया भर में एक भरोसेमंद रक्षा भागीदार के रूप में देश की स्थिति को मजबूत करने के लिए एक मजबूत प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करते हैं। भारत जैसे-जैसे उद्योगों में नवाचार और सहयोग करना जारी रखता है, वह वैश्विक रक्षा विनिर्माण में मजबूत खिलाड़ी के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत करने की राह पर है।

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नकली दुनिया की पोल खोलता आईआईटी बाबा https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%b2-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%86/ https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%b2-%e0%a4%96%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%86/#respond Fri, 24 Jan 2025 08:33:42 +0000 https://rashtriyasamasya.com/?p=8091 एक दिन जब आईआईटी बाबा अभय सिंह का वीडियो देखा तो मेरा नजरिया बदल गया। मान लीजिए आपके पास सबकुछ है- मसलन, आईआईटी बॉम्बे की डिग्री, एयरोस्पेस इंजीनियरिंग करियर और एक ऐसा जीवन जिसकी ज्यादातर लोग सिर्फ कल्पना कर सकते हैं। लेकिन आम तरह चलने के बजाय उन्होंने ऐसा चुनाव किया जिसने सभी को चौंका दिया। उन्होंने ज्यादा आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए सबकुछ त्याग दिया। पहले यकीन नहीं हुआ-कोई इतना उज्ज्वल भविष्य क्यों छोड़ेगा? लेकिन जैसे-जैसे उन्हें बात करते सुना, सबकुछ समझ में आने लगा। उन्होंने जीवन में वास्तविक उद्देश्य, शांति और अर्थ खोजने के महत्त्व पर चर्चा की- ऐसी चीजें जिन्हें कोई भी धन या सफलता खरीद नहीं सकती।

यह एक प्रेरक कहानी थी। इसने मुझे यह एहसास दिलाया कि जीवन सिर्फ समाज की अपेक्षाओं को पूरा करने या भीड़ का अनुसरण करने के बारे में नहीं है बल्कि अपना रास्ता खोजने के बारे में है। मैंने पहले सोचा,”एक आईआईटीयन इतना मूर्ख कैसे हो सकता है कि अपनी उच्च-भुगतान वाली आलीशान नौकरी छोड़ दे? वह अपनी दो डिग्रियाँ कैसे बर्बाद कर सकता है?” फिर मुझे समझ में आया कि “बचपन का सदमा”शब्द बहुत सारे नकारात्मक अर्थ रखता है। उनके साक्षात्कार वीडियो पर टिप्पणियाँ पढ़कर मुझे और भी बुरा लगा। जहाँ कई लोग उनकी प्रशंसा कर रहे थे,वहीं दूसरे लोग उन्हें नज़रअंदाज़ कर रहे थे। यहाँ मेरा उद्देश्य किसी भी तरह से उनका बचाव करना नहीं है।

बहुत शोर मचाया जा रहा है कि आईआईटी बाबा ने सरकारी फंड वाली सीट बरबाद कर दी। मेरी राय में जो लोग ऐसा कहते हैं,उन्हें कुछ बुनियादी बातों को समझने की जरूरत है। बहुत ज्यादा पढ़ाई करने के बाद अभय सिंह को आईआईटी में दाखिला मिल गया और उन्होंने अपनी डिग्री हासिल की। उन्होंने कोर्स में कोई बाधा नहीं डाली। फिर,इस तर्क से आईआईटी के बाद एमबीए और यूपीएससी करने वालों ने सीटें बरबाद कर दीं। तो फिर, मुझे बताइए कि उन्होंने सीटें कैसे बर्बाद कीं। अगर उन्होंने कोर्स पूरा नहीं किया होता तो भी यह तर्क कुछ हद तक सही होता लेकिन चूँकि उन्होंने एयरोस्पेस इंजीनियरिंग पूरी की है इसलिए किसी को यह दावा नहीं करना चाहिए कि उन्होंने अपनी सीट बर्बाद कर दी।

देखिए कि उनका नजरिया कितना बेहतरीन है। उनके पास सबकुछ था- सबसे अच्छी औपचारिक शिक्षा, सबसे अच्छी नौकरी, विदेश यात्रा, गर्लफ्रेंड और रिश्ते। फिर उन्होंने अपने अंदर खालीपन महसूस किया और संन्यास की राह पर चलने का फैसला किया। मुझे कहना होगा कि वे एक ईमानदार व्यक्ति लगते हैं। वे हरियाणा के मूल निवासी हैं। झज्जर, हरियाणा में ही उनका जन्म हुआ। उनकी माँ घर पर रहती हैं जबकि उनके पिता वकालत करते हैं। उन्होंने झज्जर में पढ़ाई की। वे कम उम्र से ही असाधारण छात्र थे। आईआईटी बॉम्बे से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल की। फिर उन्हें तीन लाख रुपये का पैकेज मिला और वे अपनी नौकरी के लिए कनाडा चले गए। लॉकडाउन के कारण वे कनाडा में ही फंस गए। इस दौरान उन्होंने अपने जीवन पर अधिक चिंतन करना शुरू किया।

भारत आने के बाद वे एक नए आध्यात्मिक मार्ग पर चल पड़े। वे बहुत-सी तीर्थयात्राओं पर गए। वे अपनी वर्तमान जीवनशैली से संतुष्ट नहीं थे। इसलिए वे बहुत आध्यात्मिक हो गए। वे हमेशा अपना घर छोड़ना चाहते थे। आध्यात्मिक शब्दावली में वह चीज जो सब कुछ पार कर जाती है उसे “सत्य” कहा जाता है। उन्होंने यहाँ तक कहा कि हर कोई मेरी आईआईटी डिग्री को ही दर्शाता है। मैं उस पर ध्यान आकर्षित नहीं करना चाहता। व्यक्तिगत रूप से मैं उससे कहीं ज़्यादा हूँ। उन्होंने सत्य की खोज में सभी सांसारिक सुखों से मुंह मोड़ लिया। उन्होंने युवाओं को प्रोत्साहित करते हुए आध्यात्मिकता की ओर अपनी यात्रा शुरू की। चूँकि उन्होंने होशपूर्वक जीवन जिया और चले गए इसलिए उनके विचार बहुत शुद्ध हैं। इसलिए, कृपया उन्हें पाखंडी कहना बंद करें। अपनी आध्यात्मिक यात्रा में वे ईमानदार और प्रतिबद्ध हैं। सत्य और जीवन के उद्देश्य की निरंतर खोज के माध्यम से ही औसत व्यक्ति आध्यात्मिकता से प्रबुद्ध होता है। यू ट्यूबर ने बाबा अभय सिंह का साक्षात्कार लिया। इसके बाद, उन्होंने खुलासा किया कि आध्यात्मिकता को आगे बढ़ाने के लिए सबकुछ छोड़ने से पहले वे आईआईटी में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल कर रहे थे।

अभय सिंह चाहते तो अपने आईआईटी के नाम का इस्तेमाल एक सफल व्यवसाय शुरू करने और बाबा बनने के लिए कर सकते थे। हमने बहुत से आध्यात्मिक गुरुओं को देखा होगा जो खुद को मार्केट करने के लिए आईआईटी,आईआईएम टैग का इस्तेमाल करते हैं। इंटरव्यू के दौरान,अभय सिंह ने पहले रिपोर्टर को यह भी नहीं बताया कि वह एक आईआईटीयन हैं। अपनी शैक्षिक पृष्ठभूमि के बारे में रिपोर्टर के सवाल के जवाब में अभय सिंह ने जवाब दिया,”हाँ,मैं आईआईटी बॉम्बे से हूँ।” अभय सिंह ने सच की तलाश करके वाकई मिसाल कायम की है। आप उनके इंस्टाग्राम पर जाकर देख सकते हैं कि वह कितने ज्ञानी हैं। प्रशंसा वास्तव में उस व्यक्ति की है जिसने सबकुछ त्याग दिया है और आध्यात्मिक मार्ग पर चल रहा है। उसने सत्य की खोज में सभी सांसारिक सुखों से मुंह मोड़ लिया। उन्होंने युवाओं को प्रोत्साहित करते हुए आध्यात्मिकता की ओर अपनी यात्रा शुरू की। “जो शून्य हैं वही शिव से मिल सकते हैं”उनके दो उद्धरणों में से एक है जिसे हमेशा याद रखूँगा- “कहाँ जाओगे चलते चलते? यहीं आओगे।”

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रेवड़ियों पर केंद्रित होता दिल्ली विधानसभा चुनाव https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a5%8b/ https://rashtriyasamasya.com/%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a5%8b/#respond Thu, 23 Jan 2025 07:58:38 +0000 https://rashtriyasamasya.com/?p=7975 दिल्ली में चुनावी घमासान के बीच रेवड़ी बांटने की प्रतिस्पर्धा-सी दिख रही है। ऐसा लगता है कि अब दिल्ली की सत्ता तक पहुँचने का मार्ग केवल मुफ्त की रेवड़ी ही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक दल जनता के बीच अपने पिटारे से मुफ्त वाली विभिन्न योजनाएं गिना रहे हैं। इस होड़ में आम आदमी पार्टी पहले ही पिटारा खोल कर बैठी है। अब कांग्रेस और भाजपा भी उसी रास्ते की ओर प्रवृत्त है। एक तथ्य ध्यान देने योग्य है कि आम आदमी पार्टी के पास कुछ नया नहीं है क्योंकि वह पिछले चार विधानसभा चुनाव से इसी राह पर चल रही है। मुफ्त की योजनाओं के वादे करना आम आदमी पार्टी की फितरत बन गई है। इससे अलग अपेक्षा नहीं की जा सकती क्योंकि यह मार्ग उसके लिए लाभकारी साबित होता रहा है। इसलिए आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को इस बार भी उन्हीं के नाम बाजी होने का पूरा विश्वास है।

वर्तमान में दिल्ली विधानसभा चुनाव के प्रचार में राजनीतिक दलों के नेताओं की ओर रेवड़ियों की झड़ी लगाई जा रही है। ऐसा लगता है कि दिल्ली की जनता को रेवड़ी की आदी हो चुकी है। इसका राजनीतिक आशय यह भी निकाला जा सकता है कि अपना नायक चुनने के लिए किसकी रेवड़ी स्वार्थ पूर्ति करने वाली है, यह ही देखा जाएगा। इस कवायद को लालच देकर वोट प्राप्त करने का माध्यम भी माना जा सकता है क्योंकि मुफ्त में खजाना लुटाना किसी प्रकार से न्यायसंगत नहीं माना जा सकता क्योंकि इसका बोझ उस समाज पर आता है, जो योजना का लाभ लेने के पात्र नहीं होते। हालांकि सरकार की तरफ से आम जनता का ध्यान रखा ही जाना चाहिए लेकिन इसके लिए मुफ्त की योजना की जगह अन्य तरीके अपनाए जाएं तो बेहतर होगा। नहीं तो एक दिन यही योजनाएं विकास योजनाएं न होकर विनाशकारी मार्ग तैयार कर सकती हैं।

दिल्ली में एक दशक पहले भाजपा और कांग्रेस के बीच ही चुनावी लड़ाई होती रही थी, लेकिन कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार के विरोध में एक धूमकेतु की तरह अरविन्द केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी उभरी, जिसने लोक लुभावने वादे कर आम जनता का छप्पर फाड़ समर्थन प्राप्त करके दिल्ली के सिंहासन को कब्जे में ले लिया। मौजूदा चुनाव में एकबार फिर बहुकोणीय मुकाबला होने की तस्वीर बन रही है। आम आदमी पार्टी साथी दलों को हाथ छुड़ा कर अकेले ही चुनावी मैदान में उतरी है। लेकिन उसकी सबसे बड़ी परेशानी यह है कि उसके नेता अरविन्द केजरीवाल पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। ऐसा कहना भी समुचित होगा कि केजरीवाल की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर है। एक समय सुविधाओं को त्याग कर राजनीति करने की कसम खाने वाले केजरीवाल की जीवन शैली भौतिक सुख-सुविधाओं से भरी मालूम पड़ती है। शीशमहल के नाम से भाजपा द्वारा प्रचारित उनके आवास में लग्जरी सुविधाएं हैं। जो उनके कथन से कतई मेल नहीं रखती। ऐसे में यह कहना तर्कसंगत होगा कि इस बार केजरीवाल की राह उतनी आसान नहीं है, जो पहले थी। दूसरी बड़ी बात यह है कि इस बार के चुनाव में आम आदमी पार्टी के समक्ष गंभीर चुनौतियाँ भी हैं। केजरीवाल जमानत पर बाहर हैं, वे दोष मुक्त नहीं हुए। उनके मुख्यमंत्री कार्यालय जाने पर प्रतिबन्ध उसी समय लगा दिया गया, जब वे मुख्यमंत्री थे, ऐसी स्थिति में केजरीवाल फिर से दिल्ली के मुख्यमंत्री बनेंगे, इसकी गुंजाइश भी नहीं है।

आम आदमी पार्टी के समक्ष एक बड़ी चुनौती यह भी है कि इस बार के चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के अलावा बहुजन समाज पार्टी और औवेसी की पार्टी भी मैदान में है। यह दोनों राजनीतिक दल जितने प्रभावी होंगे, उसका खामियाजा आम आदमी पार्टी को ही भुगतना होगा। एक गणित यह भी है कि पिछले चुनाव में अंदरूनी तौर पर कांग्रेस पार्टी का समर्थन आम आदमी पार्टी को मिला लेकिन इस बार पूरी गंभीरता के साथ कांग्रेस चुनावी मैदान में है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने केजरीवाल के समक्ष वजनदार प्रत्याशी उतार कर यह संदेश तो दिया कि इस बार केजरीवाल की पार्टी आसानी से विजय प्राप्त नहीं करेगी। क्योंकि बसपा और औवेसी के आने से केजरीवाल की पार्टी को मुस्लिम और दलित मत हासिल करने में कमी आ सकती है। ये मतदाता अतीत में कांग्रेस के वोटर रहे हैं, जिससे लगता है कि इसबार यह मतदाता कांग्रेस को ही वोट देगा।

आम आदमी पार्टी के साथ यह विसंगति जुड़ती जा रही है कि वह गठबंधन का हिस्सा केवल उन राज्यों में है, जहाँ आम आदमी पार्टी का अस्तित्व नहीं है। जहाँ केजरीवाल की पार्टी का अस्तित्व है, वहां गठबंधन के मायने बदल जाते हैं। इसका तात्पर्य यही है कि केजरीवाल स्वार्थ सिद्धि के लिए ही गठबंधन करते हैं। यह बात सही है कि केजरीवाल को अब राजनीति की समझ आ गई है। वे एक चतुर राजनीतिक नेता की तरह चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन विपक्ष की एकता के सपने को चकनाचूर कर रहे हैं। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक गठबंधन में दरार आने का ठीकरा कांग्रेस पर फोड़ रहे हैं। कुल मिलाकर यह कहना उचित होगा कि गठबंधन अब बिखरने की ओर है।

खैर, मूल विषय रेवड़ी का है। मुफ्त की रेवड़ी बांटना निश्चित ही इस बात की ओर संकेत करता है कि आज राजनीतिक दलों ने आम जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता खोई है इसीलिए चुनाव जीतने के जनता को प्रलोभन देकर वोट कबाड़ने की राजनीति की जा रही है। अब देखना यह है दिल्ली का सिंहासन किसका इंतजार कर रहा है। फिलहाल यही समझा जा रहा है कि मुख्य मुकाबला भाजपा और आदमी पार्टी के बीच है। प्रचार के लिए भाजपा के पास नेताओं की भारी भरकम फौज है तो आम आदमी पार्टी के पास केवल केजरीवाल हैं। चुनावी प्रचार के माध्यम से भाजपा अपनी बात को नीचे तक पहुंचाने का प्रयास करेगी और इसका प्रभाव भी हो सकता है। लेकिन फिर वही बात, क्या रेवड़ी के सहारे ही इस बार भी दिल्ली की सरकार बनेगी।

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