Home अपराध डीसीपी ऑफिस: चाय से ज्यादा केतली गर्म

डीसीपी ऑफिस: चाय से ज्यादा केतली गर्म

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  • बहुत कठिन है डगर डीसीपी से मिलने की
  • मोबाइल और पेन तक करा लेते हैं जमा

पूर्वी दिल्ली। अगर आप जाते हैं कभी डीसीपी कार्यालय, मन में इच्छा है कि साहब से मिलकर अपनी पीड़ा सुनायें, तो यहां तक तो ठीक है। लेकिन अगर आप सोचते हैं कि साहब से मुलाकात हो जाएगी आसानी से, तो यहां आपने गलती कर दी। अगर कहें कि ऑफिस में साहब के मौजूद होने पर भी, कोई आपसे कह दे कि नहीं हैं साहब, तो चैकिएगा नहीं, क्योंकि यह तो अब बन चुकी है आम भाषा। यहां आने पर पहले तो होगी आपकी जांच, आपके पर्स की जांच, आपका मोबाइल हो जायेगा जमा, यहां तक कि आपकी जेब में लगा पेन भी रखवा लिया जायेगा बाहर। उसके बाद ही कहीं आपको मिलेगी हरी झंडी साहब के कमरे में घुसने की।

कई चरणों से होगा गुजरना
डीसीपी साहब से मिलना है आपको, तो पहला चरण है आपका इमारत के बाहर बैठा पहरेदार। सबसे पहले आप जी-हुजूरी करिये इन साहब की, पहले इनको बताईये कि कौन हो तुम? कहां घुसे जा रहे हो? इनको दिखाइये अपनी शिकायत, साथ में लगे कागजात, कहां कहां पहले कर चुके हो शिकायत? वहां से अब तक क्या क्या हुआ? अगर इन साहब को मुनासिब लगा कि आपको जाने दिया जाये अंदर, तो ही आप काबिल हैं, अन्यथा बाहर से ही करिये दर्शन इमारत के।
अगर इस चरण में हो गये आप पास, तो अब खुद को तैयार करिये दूसरे चरण के लिए। ये साहब आपको मिलेंगे इमारत में ठीक घुसते ही, आपसे इशारे में पूछेंगे कि कहां? इनसे कहिये कि मुझे मिलना है डीसीपी साहब से, तब पता चलेगा आपको कि मिलने के लिए पहले बनवाना होगा पास, बताना होता है आपको अपना नाम, पता, मोबाइल नम्बर, काम और सिफारिश। काउंटर पर बैठी महिला कर्मी पहले तो लेंगे फोन पर इजाजत, फिर बनायेंगी आपका पास।
पास बनने पर आप ये मत समझना कि अब हो जायेगी मुलाकात, अब कोई नहीं रोकेगे। क्योंकि इस चरण के बाद आयेगा आपका अंतिम चरण, पास लेकर आप जैसे ही जायेंगे साहब के कमरे की तरफ, तो वहां मिलेगा आपको एक अलग से कमरा, जिसमें फिर पूछा जायेगा आपसे नाम और काम। उनके मुंह से निकली पहली बात ‘‘साहब तो हैं नहीं या साहब निकलने वाले हैं’’ कर देगी आपके मन को ठंडा, क्योंकि आपकी अब तक की सारी मेहनत लगेगी आपको बेकार। अगर आपके दिन चल रहे होंगे अच्छे, तो ही ये आपसे मुखातिब होंगे सलीके से। लेकिन उसके बाद भी अब आपका मोबाइल होगा इनके पास जमा, आपका बैग रखवा लिया जायेगा बाहर, पर्स तो रही छोटी बात, आपकी जेब में लगा पेन भी इनको जायेगा आखों में खटक। जिसके बाद आप खुद को करेंगे एक मुजरिम जैसा महसूस, धिक्कार होगा आपको अपने खुद के फैसले पर, कोसने का मन करेगा खुद ही, आखिर क्या पड़ी थी इनसे मिलने की।
लेकिन मुद्दा तो यह है कि आखिर क्यों होता है ऐसा? क्या दिक्कत हो सकती है साहब को अगर आप अपना पेन और मोबाइल लेकर जाते हैं उनके कमरे में। जबकि ऐसा भी नहीं है कि यह सब महसूस करने वाले आप पहले होंगे, क्योंकि पहले भी उच्च न्यायालय से लेकर उच्चतम न्यायालय तक दे चुके हैं कई बार फैसला ऐसे ही मुद्दों पर। मगर जो एक बार में मान जाये, वो पुलिस कैसी।