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प्रदूषण की सुनवाई में, इंसाफ के सिवा सब मिलता है !!!

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प्रदूषण की सुनवाई में इंसाफ के सिवा सब मिलने लगा। मित्रों, प्रदूषण भ्रष्टाचार का ऐसा कुआं बन चुका जिसमें हर जिम्मेदार नहाना चाहता। अगर जिंदगी भर मौका मिले तब भी पेट नहीं भरता और दिल्ली एनसीआर के उत्पात तो किसी के नियंत्रण में नहीं रहे। देखो सुप्रीम कोर्ट सांस नहीं दिला पा रही। एनजीटी प्यास नहीं बचा पा रही। भला बताओ-दुनिया की सबसे बड़ी अदालत सबसे सुलझे हुए जज प्रदूषण के सामने लाचार उनकी सुनवाई उनके आदेश कोई बदलाव नहीं कर पा रहे। देखो-एनजीटी के होते हुए खाओ जहर पियो जहर चिल्लाना मत, सुनेगा कोई नहीं, हर साल सांसों का अकाल हर साल फरवरी का इंतजार और यह दशा तब है जब दुनिया का सबसे बड़ा संविधान सबसे बड़ी अदालत सुलझे हुए जज फिर भी मरी नदी अधमरी हवा देश दिल्ली की पहचान बनते देखी जा रही सब्जी, फल हम खा रहे या वह हमें पी रहे ना कहीं आंख ना कहीं कान दोस्तों ऐसा क्या हुआ। जो जमीन से आसमान तक की चमक वापस लाने की हैसियत वाली एनजीटी आज अपनी उपलब्धियां अपना मकसद जिंदा नहीं देख पा रही आलोचनाएं होने लगी देखो कोई कहने लगा।

प्रदूषण की सुनवाई में इंसाफ के सिवा सब मिलता है कोई कहने लगा अफसरों का छल कपट उनकी झूठी अधूरी रिपोर्ट एनजीटी उसकी उपलब्धियां नाश का कारण ना बन जाए, ऐसा लगने लगा जिसे कानून के कान मरोड़ना मंजूर मगर प्रदूषण जिंदा रखना जरूरी अफसरी के लिए एनजीटी की सुनवाई खत्म करना मंजूर, मगर झूठी अधूरी रिपोर्ट देना अधिकार नौकरशाही का! भला बताओ-जो इंडस्ट्री वेस्ट एनजीटी ने नदी नाश का कारण बताया वही जहर आज उसी एनजीटी को कोई अपराध नहीं लग रहा। कोई प्रदूषण भी नहीं लग रहा। देखो कहीं बिना लाइसेंस 1000 भैंस रोज काटना। एनजीटी के लिए कोई अपराध नहीं। बिना ईटीपी 800 से 1000 केएलडी खून पानी बहाना कोई प्रदूषण नहीं। दिल्ली बरेली के दो मामले मजबूत प्रमाण है। भला बताओ एनजीटी में निष्पक्षता का संकट कैसे ना कहा जाए? मित्रों प्रदूषण भ्रष्टाचार का ऐसा कुआं बन चुका है जिसमें हर जिम्मेदार नहाना चाहता है और जिंदगी भर लूटने को मिले तब भी पेट नहीं भरता। देखो मरी नदी विषैली एक्यूफायर। देश आबादी दोनों की जिंदगी का हिस्सा बना दिया। दुनिया का सबसे बड़ा दुश्मन देश का सबसे बड़ा हत्यारा सिस्टम, कानून, कोर्ट तीनों को मुंह फैलाए चिढ़ा रहा है। एनजीटी प्यास नहीं बचा पा रही। भला बताओ दुनिया की सबसे बड़ी अदालत, अनुभवी और सुलझे हुए जस्टिस फिर भी खतरनाक दुश्मनों का कुछ नहीं कर पा रहे। देखो कोई कह रहा प्रदूषण की सुनवाई में इंसाफ के सिवा सब मिलता है। कोई कह रहा अफसरों का छल कपट उनकी झूठी अधूरी रिपोर्ट। एनजीटी खत्म करने का कारण ना बन जाए, तो क्या एनजीटी में निष्पक्षता का संकट घर बना लिया और क्या अफसरों पर एनजीटी का बिल्कुल नियंत्रण नहीं रहा?