निशांत सिंह
आखिर देश-दिल्ली की दुर्दशा का जिम्मेदार कौन.! जनता के लिए दम घोटू हवा, कुछ अफसर-नेता-जज के लिए एयर प्यूरीफायर, ऐसी नाइंसाफी-ऐसे अन्याय ने दिल्ली को अनाथ छोड़ दिया। अच्छा कानून होते हुए, मरी नदी-अधमरी हवा, देश दिल्ली की पहचान बनते देखी जा रही। अगर लिखें की कानूनी दबंगई ने दिल्ली शहर बर्बाद कर दिया, तो बिल्कुल सही है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि दुनिया में सबसे अच्छा कानून, सबसे अच्छी अदालत, सबसे अच्छा देश फिर क्यों हर साल मौतें देखना, हर साल तारीखें गिनना, हर साल फरवरी का इंतजार और हर साल मार्च से सितंबर तक, पैर पसारे सो जाना, ऐसी अच्छाइयों को मौत क्यों नहीं खा पाती…?
देखो कोई कह रहा–अदालती सुनवाई कि इतनी बुरी दशा कभी नहीं देखी, तो कोई कह रहा- असंवैधानिक संस्थाओं के भ्रष्टाचार, एनजीटी-सुप्रीम कोर्ट किसी के नियंत्रण में नहीं रहे, बहरहाल एक तरफ दम फुलाने वाली हवा आबादी के फेफड़े नोचने-खाने लगी, दूसरी तरफ सीपीसीबी कि हेराफेरी, मतलब आधे से कम ए.क्यू.आई. में दिखाना ऐसी आफत बनती जा रही, जो लोगों को और भी विचलित कर रही. बहरहाल पिछले दिनों मीडिया के टॉप संस्थाओं ने सीपीसीबी की अनैतिक गतिविधियों, उनकी हेराफेरी, उनके सांसे गिन रहे यंत्र का जोरदार खुलासा किया था। मगर नौकरशाही की ढीठता, उनके भ्रष्टाचार के सामने मीडिया की सुर्खियां भी हवा-हवाई साबित हुई, बहरहाल आज का ए.क्यू.आई. 571 दिखाया गया, भला बताओ ऐसा जहर बच्चे-बुजुर्ग बीमार की क्या दशा करेगा? जवान आबादी को कितना और कितने दिन बलवान रहने देगा? और यह दशा तब है जब जहरीली हवा का मानक 571 दिखाया, अगर यह पैमाना सही माप देने लगें तो क्या समझेंगे विदेशी मेहमान?
बहरहाल, दिल्ली के लोगों को अगले सप्ताह भर प्रदूषित हवा से राहत मिलने के आसार नहीं हैं, और अगर वहीं बात करें केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की तो अपनी नाकामी बताते हुए हवा का स्तर जस का तस बताने की बेशर्मी पर आमादा है। दिल्ली में जितनी भी कार्बन का उत्सर्जन करने वाली फैक्ट्रियां, कारखाने, इंडस्ट्रीज, जिन्हें केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मलाईदार प्रमाण पत्र तो देता है, लेकिन उनके विषैले धुएं और काले कारनामों को रोकने और उनकी गुणवत्ता सुधारने के समय पांच सितारा ऑफिसों में एयर-प्यूरीफायर लगाकर सौफों पर विराजमान हो अपनी कामयाबी और उपलब्धियों का बखान करता है। हद तो तब हो जाती है जब केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का लाइसेंस वितरण करने वाला लजीज विभाग उन्हीं फैक्ट्रियों के धुएं से बने हुए गैस चैंबर बनी दिल्ली से आंखें चुराता है। बहरहाल, बेहाल दिल्ली को घोर निराश करने वाले सभी पर्यावरणीय महकमों से मिली निराशा के बाद अब वायुदेव की कृपा का इंतजार है। जिन हवाओं के तीव्र वेग से चलने के बाद ही जहरीली दिल्ली का एक्यूआई कम हो जाए तो एयर प्यूरीफायर नहीं खरीद पाने वाले दिल्ली की जनता जर्नादन को जहरीली सांसों से कुछ मुक्ति मिल जाए।









