दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट केवल दुनिया की ही सबसे ऊंची चोटी नहीं है बल्कि यह धरती के भूवैज्ञानिक इतिहास का जीता जागता प्रमाण भी है। वैज्ञानिकों के अनुसार एवरेस्ट की चट्टानों में समुद्री जीवों के जीवाश्म पाए गए हैं जो यह बताते हैं कि करोड़ों साल पहले यह क्षेत्र समुद्र के नीचे था। भारतीय और यूरेशियन टैक्टोनिक प्लेटों के टकराने से हिमालय पर्वत श्रृंखला बनी और आज भी यह प्रक्रिया जारी है। जिस कारण एवरेस्ट हर साल लगभग 4 से 5 मि. मी. ऊंचा हो रहा है। यही वजह है कि समय-समय पर इसकी ऊंचाई का दोबारा सर्वे किया जाता है। एवरेस्ट का ऊपरी हिस्सा “डेथ जोन” कहलाता है जो समुद्र तल से लगभग 8000 मीटर की ऊंचाई पर शुरू होता है। इस जोन में आॅक्सीजन का स्तर इतना कम होता है कि मानव शरीर लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकता। यहां तापमान 60 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता और जेट स्टीम हवाएं 160 से 200 किमी/घंटे की रफ्तार से चतली हैं। इन हालात में इंसान को भ्रम, याददाश्त कमजोर होना और शरीर के अंगों का काम करना बंद होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसी कारण कई पर्वतारोहियों के शव आज भी एवरेस्ट पर ही मौजूद हैं। जिन्हें नीचे लाना बेहद जोखिम भरा होता है। एवरेस्ट को नेपाल में “सागरमाथा” कहा जाता है। जिसका अर्थ है आकाश का मस्तक। जबकि तिब्बत में इसे चोमोलुंगमा यानी पृथ्वी की देवी मां माना जाता है। स्थानीय लोग इसे सिर्फ पहाड़ नहीं बल्कि पवित्र शक्ति के रूप में पूजते हैं। बढ़ते पर्यटन के कारण एवरेस्ट पर कचरे की समस्या भी गंभीर हो गई है। इसलिए अब नेपाल सरकार ने पर्वतारोहियों के लिए सख्त नियम बनाए हैं। एवरेस्ट आज सिर्फ साहस और रोमांच को प्रतीक नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण और मानव सीमाओं की परीक्षा का भी प्रतीक बन चुका है।









