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आजाद देश का गुलाम विभाग

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समस्या टीम
सरकारी सेवा मिट्टी को, तन-मन मिट्टी को, फिर भी मिट्टी नहीं समझ पायी अफसर की भावना। काश! मिट्टी भी समझ जाती, उसकी सेवा स्वीकार लेती, तो मेरा देश भी कैमीकल मुक्त होता। दोस्तो! जिसने क्या कुछ नहीं किया, किन-किन हालात में किसानों को जोड़ा, कैसे-कैसे अल्फाजों में समझाया, क्या-क्या समय तय किये, काश पेस्टीसाइड-इन्सैक्टीसाइड भी समझ पाती, तो मेरा देश भी रसायन मुक्त होता। दोस्तो 80 फीसदी आबादी हांफने लगी, बच्चे-जवान-बूढ़े 30 सैकेंड सांस नहीं रोक पाते, फिर भी आम हो, या पपीता, केला, सबको कार्बेड सम्हालती है। सेब-संतरा के बागान हो, या सब्जियों के खेत अथवा फार्म हाऊस, सब्जी-फलों की पहरेदारी सिर्फ रसायन करते हैं।
कहने को डाॅ. सचान एक कृषि अफसर हैं, मगर सच यह कि इस अफसर ने अपनी उम्र हो, अपना तन-मन हो, सरकारी सेवा हो, सब कुछ मिट्टी को ही दे रखी है।
अलीगढ़ से आगरा तक, झांसी से मध्य प्रदेश तक ना जंगल झाड़ी बचीं, ना नदी-नहरें ऐसी हैं जहां डाॅ. सचान ने पैर नहीं रखे, हालांकि कुछ विभागीय मेहरबानियां रहीं, कुछ अडंगेबाजी भी रहीं, कुछ जलन-ईष्र्या भी रहीं, मगर इनकी मेहनत, इनकी निष्ठा ही ऐसी रही, कि इकलौते सचान, पैदल सचान, फिर भी हजारों में गांव जोड़ दिये, कई लाख किसानों में जागरूकता जगाई।
लिहाजा कहा जा सकता है कि सचान की भक्ती में दम है, जिसने अपने पैरों से चल-चल कर किसानों को जोड़ा, खेतो-खेतों चलकर नुकसान समझाये, चुनौती मारने के ढंग बताये, जिसने विभागीय नाराजगियों की चिंता नहीं की, जिसने नौकरी को अपना भक्त तो माना, मगर असली सेवा क्या असली चुनौती क्या, सिर्फ उसी को देखा… काश ऐसी ताकत को दुकानदारी का सहयोग मिलता, विभागीय मदद होती, तो कमाई से ज्यादा बीमारी पर खर्चने वाला देश भी बीमारी मुक्त होता।
यूं तो कृषि देश का सबसे बड़ा विभाग है, किसान वेलफेयर और डायरेक्ट्रेट प्लांट प्रोटेक्शन जैसे इसके दाहिने हाथ हैं, मगर डराने वाला सच यह कि भूख ने यहां की अफसरी को इतना पैदल कर दिया कि विचार, नियत, सब अपाहिज कर दिये। यही वजह है कि बीमार देशों की सूची में हमारा देश सबसे आगे दौड़ रहा, आमदनी से ज्यादा बीमारी पर खर्च यहां शौक बना दिया है।
दोस्तो! दुनियां का इकलौता देश कहें या आजाद भारत की गुलाम आदत, यहां बेचो जहर, खाओ जहर, पियो जहर, कुछ भी अपराध नहीं। यही वजह है कि सबसे ज्यादा बीमारियां, सबसे ज्यादा बीमार, सबसे ज्यादा मौत, फिर भी किसी वेबसाइट पर डाटा नहीं।
सब्जी हों, फल हो, गेहूं या दाल हो, उसमें वजन बराबर पेस्टीसाइड इन्सैक्टीसाइड पिलाने के बाद ही मंत्रालय को नींद आती है। यूं तो कागजों में रसायन की मात्राएं भी लिखीं हैं। मगर नियत इतनी कोरी है कि बीसों साल बाद भी रसायन खपाने की मात्रा किसान नहीं जान पाते।
अगर लिखे कि आजाद देश में कुछ गुलाम विभाग भी हैं, तो वहां भी हम ही आगे निकलेंगे। क्योंकि हमारे देश में अनाज नहीं, परियोजनायें, भरती हैं पेट।
कहने को यहां कृषि के साथ एमओईएफ, सीपीसीबी भी ऐसे विभाग, ऐसी एजेंसियां हैं, जो बनाई गयी देश स्वस्थ्य रखने के लिए, मगर कारनामें निकलते हैं तो अपाहिज करने वाले। दोस्तो! पेस्टीसाइड दुनियां का इकलौता ऐसा कोरोना है, जो बिना पैर वाला है, जिसे भारत के सिवाय कोई और देश सुहाता ही नहीं हैं। मगर हुनरमंद इतना कि इसने कृषि, एमओईएफ और केन्द्रीय प्रदषण, तीनों को अपना भक्त बना लिया है।