Home पर्यावरण जलीय जीवों का घर, डंपिंग ग्राउंड किसने बना दिया?

जलीय जीवों का घर, डंपिंग ग्राउंड किसने बना दिया?

(निशांत सिंह)
नई दिल्ली। जलीय जीवों का घर डंपिंग ग्राउंड किसने बना दिया? ना पानी बचा, ना उसकी जगह बची, भला बताओ- इसमें रहने वाले जलीय जीव और पेड़ पौधे कैसे बचे होंगे, जिनका घर डंपिंग ग्राउंड को दे दिया, उन जीवों के लिए प्रलय किसने पैदा कर दी। जलीय जीव और पौधों के लिए प्रलय नहीं तो क्या है? एमसीडी हों, डीडीए हांे, डीपीसीसी हों, उन्हें बताना चाहिए- ऐसे विकास से क्या हासिल किया? और ऐसे विकास पर किसके होटल, किसके काॅम्पलेक्स बनवाने के ख्वाब देखे गये? यूं तो दिल्ली के 23 बड़े तालाबों पर इंसानी विकास की बुरी नजर है, पहले पूर्व सरकार ने इन्हें झील नगर बनाने के ख्वाब दिखाये, इनके नाम पर 366 करोड़ की बेईमानी की, अब मौजूदा सरकार हो ना हो, मगर अफसरों की बुरी नजर अब भी वैसी ही है।
फिलहाल वजीराबाद एरिया में स्थित पहला जलीय जीव और पौधों के घर की सच्चाई एनजीटी में पहुंच चुकी है। स्वतः संज्ञान मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सेंथिल वेल ने वजीराबाद वेटलैंड की दुर्दशा पर गम्भीर चिंता जताई, अगली सुनवाई के 27 अक्टूबर का दिन मुकर्रर किया गया, एजेंसियों को आदेश हुआ कि अगली सुनवाई से एक सप्ताह पहले हलफनामा दाखिल करें।
एक अंग्रेजी अखबार में छपी खबर के मुताबिक वजीराबाद के पास स्थित एक वेटलैंड (झरोड़ा तालाब), जो पहले पानी के जीवों और पौधों का घर था, जो अब नगर पालिका का कूड़ाघर बन चुका है। रिपोर्ट के अनुसार भलस्वा लैंडफिल से लाया गया मलबा वेटलैंड में डाला जा रहा है, जिसके कारण यह तालाब अब पूरी तरह से गायब हो गया है, जिसपर स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले दो साल से यहां डंपिंग का काम हो रहा है, मगर तमाम प्रयास और शिकायतों के बाद भी प्रशासन की नींद नहीं टूट रही है।
इस पर एनजीटी की अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य सेंथिल वेल वाली खण्डपीठ ने माना कि यह घटना वेटलैंड संरक्षण नियम 2017 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 का खुला उल्लंघन है। परन्तु चैकाने वाली बात यह है कि दिल्ली वेटलैंड प्राधिकरण की सूची में केवल दो वेटलैंड ही अधिसूचित है, और झरोड़ा क्षेत्र के बाहर के कई संभावित वेटलैंड अभी तक अधिसूचित नहीं किये गये हैं।
जिस पर नाराजगी जताते हुए एनजीटी ने डीपीसीसी, डीडीए, सीपीसीबी, डीएम उत्तर दिल्ली और एमसीडी को आदेश दिया वे अगली सुनवाई से एक सप्ताह पहले ही हलफनामा दाखिल करें और अगर कोई एजेंसी सीधे हलफनामा दाखिल करती है तो उसे आॅनलाइन सुनवाई में भी शामिल होना होगा।

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